20 करोड़ से ज्यादा का बजट, टेंडर भी जारी… फिर दो साल से गड्ढों में क्यों फंसा भरतपुर का गोलपुरा बाईपास?

भरतपुर के गोलपुरा बाईपास पर 20 करोड़ रुपये से अधिक का बजट स्वीकृत होने के बावजूद निर्माण अधूरा है। गड्ढों, जलभराव और चौड़ाई के विवाद से लोग परेशान हैं।

संत कौशिक | वरिष्ठ पत्रकार

भरतपुर। किसी सड़क के निर्माण के लिए बजट स्वीकृत हो, ठेकेदार को काम भी सौंप दिया जाए और तय समयसीमा निकलने के बाद भी सड़क अधूरी पड़ी रहे, तो सवाल सिर्फ निर्माण की रफ्तार पर नहीं, सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही पर भी उठते हैं। भरतपुर के गोलपुरा बाईपास की मौजूदा स्थिति कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश कर रही है। हीरादास केंद्रीय रोडवेज बस स्टैंड से सेवर-मथुरा बाईपास को जोड़ने वाले करीब दो किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर पिछले दो साल से गड्ढे, कीचड़ और जलभराव लोगों की परेशानी बने हुए हैं।

विडंबना यह है कि सड़क के पुनर्निर्माण और चौड़ीकरण के लिए 20 करोड़ रुपये से अधिक का बजट स्वीकृत है। सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) टेंडर भी जारी कर चुका है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक निर्माण कार्य अभी 20 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंचा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है, तो जमीन पर काम की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है?

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बजट और टेंडर के बाद भी काम की रफ्तार क्यों नहीं बढ़ी?

गोलपुरा बाईपास की बदहाली अब केवल सड़क की सतह तक सीमित नहीं रह गई है। सड़क चौड़ीकरण के साथ नालों का निर्माण भी होना है, लेकिन निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के बावजूद ये काम अधूरे हैं। इसका खामियाजा रोजाना इस मार्ग से गुजरने वाले वाहन चालकों और राहगीरों को भुगतना पड़ रहा है। गहरे गड्ढों और पानी से भरे हिस्सों के कारण आवागमन जोखिम भरा बना हुआ है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए स्थिति खास तौर पर मुश्किल है और दुर्घटनाओं की आशंका लगातार बनी रहती है।

यहां सबसे बड़ा सवाल निर्माण एजेंसी और संबंधित विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर है। आखिर काम में देरी की वजह क्या है? क्या निर्माण की प्रगति की नियमित समीक्षा हो रही है? और जब तय समय निकल चुका है, तो परियोजना पूरी करने की नई समयसीमा क्या होगी? इन सवालों के जवाब के बिना लोगों की परेशानी दूर होती नहीं दिख रही।

80 फुट या 100 फुट? चौड़ाई के विवाद में लोगों ने खुद हटाए निर्माण

गोलपुरा बाईपास की कहानी में सड़क निर्माण की देरी के अलावा चौड़ाई को लेकर पैदा हुआ असमंजस भी जुड़ा है। वर्ष 2002 में राज्य स्तरीय भू-उपयोग परिवर्तन समिति, राजस्थान, जयपुर ने नगर विकास न्यास के सुझाव से सहमति जताते हुए इस बाईपास की चौड़ाई 80 फुट निर्धारित की थी।

इसके बावजूद पिछले एक साल से 100 फुट चौड़ाई किए जाने की चर्चा और विभागीय स्तर पर कही जा रही बातों ने सड़क किनारे रहने वाले लोगों को चिंता में डाल दिया। मकान और दुकानों के हिस्से टूटने की आशंका के बीच दर्जनों लोगों ने अपने निर्माण स्वयं हटाकर लाखों रुपये का नुकसान उठाया।

अब प्रशासन के आदेश पर सड़क की चौड़ाई फिलहाल 80 फुट रखे जाने से प्रभावित लोगों को राहत मिली है। लेकिन इससे एक असहज सवाल भी खड़ा होता है—यदि चौड़ाई 80 फुट ही रखनी थी, तो 100 फुट को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण लोगों को इतना आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी क्यों झेलनी पड़ी? इस मामले में केवल अंतिम निर्णय बताना पर्याप्त नहीं होगा। लोगों के मन में उठे सवालों का जवाब और जिम्मेदारी तय होना भी जरूरी है।

लोगों ने जमीन छोड़ी, लेकिन सड़क और नालों का इंतजार खत्म नहीं हुआ

सड़क किनारे निर्माण हटाने वाले लोगों को उम्मीद रही होगी कि जमीन उपलब्ध होने के बाद चौड़ीकरण और नालों का काम तेजी से आगे बढ़ेगा। लेकिन निर्माण अधूरा रहने से उनकी मुश्किलें कम नहीं हुईं। एक तरफ कुछ लोगों को मकान-दुकानों के हिस्से हटाने से आर्थिक नुकसान हुआ, तो दूसरी तरफ बदहाल मार्ग का असर आसपास के कारोबार पर भी पड़ रहा है। ग्राहकों और वाहन चालकों की आवाजाही प्रभावित होने से दुकानदारों की परेशानी बढ़ रही है। यानी जिन लोगों ने सड़क निर्माण के लिए जगह छोड़ी, उन्हें अब तक बेहतर सड़क की सुविधा नहीं मिल पाई है। विकास कार्य का उद्देश्य लोगों को राहत देना है, लेकिन यहां अधूरे काम के कारण लोगों को नुकसान और परेशानी दोनों का सामना करना पड़ रहा है।

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दर्जनों कॉलोनियों और गांवों की आवाजाही इसी रास्ते पर निर्भर

गोलपुरा बाईपास भरतपुर शहर और आसपास के क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। सुभाष नगर, राधा नगर, गोलपुरा, अशोक विहार, बजरंग नगर, स्टेडियम नगर, अड्डा और मढ़ौनी समेत अनेक कॉलोनियों और गांवों के लोग इस रास्ते का इस्तेमाल करते हैं।

रोडवेज बसों के अलावा निजी और लोक परिवहन के वाहन भी इसी मार्ग से गुजरते हैं। प्रतिदिन हजारों वाहनों की आवाजाही होने के कारण सड़क की बदहाली का असर व्यापक है। परेशानी केवल आसपास रहने वाले लोगों तक सीमित नहीं, बल्कि यात्रियों, ग्रामीणों, व्यापारियों और वाहन चालकों तक पहुंच रही है। ऐसे महत्वपूर्ण मार्ग पर निर्माण कार्य की धीमी रफ्तार का असर रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ना स्वाभाविक है। इसी वजह से लोगों की मांग है कि परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर पूरा कराया जाए।

हादसे के बाद कार्रवाई होगी या पहले सुधरेगी सड़क?

गड्ढों, कीचड़ और जलभराव से भरे रास्ते पर हर दिन गुजरना लोगों की मजबूरी बना हुआ है। निर्माण कार्य की समयसीमा निकलने के बाद भी अपेक्षित प्रगति नहीं होने से क्षेत्रवासियों में नाराजगी बढ़ रही है। अब सवाल यह है कि निर्माण एजेंसी और सार्वजनिक निर्माण विभाग काम की वास्तविक स्थिति तथा देरी के कारणों को सार्वजनिक करेंगे या नहीं। जिला प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि अधूरे निर्माण के कारण लोगों की सुरक्षा से समझौता न हो। स्थानीय लोगों की मांग है कि निर्माण पूरा करने की नई समयसीमा घोषित की जाए, काम की नियमित निगरानी हो और लापरवाही मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही सड़क पूरी होने तक गड्ढों और जलभराव से राहत देने के लिए अस्थायी सुधार और सुरक्षा के उपाय किए जाने चाहिए।

गोलपुरा बाईपास का मामला अब केवल एक सड़क के निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है। करोड़ों रुपये की मंजूरी, टेंडर और निर्धारित समयसीमा के बावजूद यदि आमजन को लंबे समय तक बदहाल मार्ग से गुजरना पड़े, तो विकास योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब देखने वाली बात यही है कि गोलपुरा बाईपास पर काम की रफ्तार बढ़ाने और लोगों को राहत दिलाने के लिए जिम्मेदार विभाग कब ठोस कदम उठाते हैं।

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