बीजिंग
किडनी (Kidney) की बीमारी से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए यह खबर किसी चमत्कार से कम नहीं। कनाडा (Canada) और चीन (China) के वैज्ञानिकों ने मिलकर ऐसी ‘यूनिवर्सल किडनी’ तैयार की है, जो किसी भी ब्लड ग्रुप वाले मरीज को लगाई जा सकती है। इसका मतलब— अब ब्लड मैचिंग की जटिलता और वेटिंग लिस्ट की लंबी कतार में फंसे मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती है।
वो दीवार जो अब टूटने वाली है…
अब तक किडनी ट्रांसप्लांट के लिए डोनर और रिसीवर के ब्लड ग्रुप का मैच होना जरूरी था।
O टाइप ब्लड को ‘यूनिवर्सल डोनर’ कहा जाता है, यानी इसकी किडनी किसी भी ग्रुप (A, B, AB या O) वाले को दी जा सकती है।
लेकिन O टाइप डोनर्स बहुत कम मिलते हैं — नतीजा यह कि आधे से ज्यादा मरीज O टाइप किडनी का इंतजार करते हुए जिंदगी की जंग हार जाते हैं।
अकेले अमेरिका में हर दिन औसतन 11 मरीज किडनी न मिलने से दम तोड़ देते हैं। भारत में भी लाखों लोग सालों से डायलिसिस पर हैं।
कैसे बनी यूनिवर्सल किडनी?
कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के बायोकेमिस्ट स्टीफन विथर्स की टीम ने एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने A टाइप की किडनी को ऐसे एंजाइम्स से ट्रीट किया जो उसकी सतह से ब्लड ग्रुप पहचानने वाले शुगर मॉलिक्यूल्स (एंटीजेंस) को काट देते हैं।
यही एंटीजेंस बॉडी को बताते हैं कि यह किडनी ‘अपनी’ है या ‘विदेशी’। एंटीजेंस हटते ही किडनी O टाइप जैसी न्यूट्रल बन जाती है — जिसे किसी भी ब्लड ग्रुप वाले मरीज के शरीर में लगाया जा सकता है।
विथर्स इसे बड़े सरल शब्दों में समझाते हैं:
“जैसे किसी लाल कार से पेंट हटाकर उसे न्यूट्रल प्राइमर रंग में बदल देना — ताकि हर किसी को सूट करे।”
पहला सफल प्रयोग इंसानी शरीर में
रिसर्च टीम ने यह प्रयोग ब्रेन-डेड व्यक्ति के शरीर में किया, जिसे परिवार की सहमति से वैज्ञानिकों को सौंपा गया था। A टाइप की किडनी को एंजाइम्स से ट्रीट करने के बाद ट्रांसप्लांट किया गया — और वह कई दिनों तक सामान्य रूप से काम करती रही। उसने ब्लड फिल्टर किया, वेस्ट हटाया और शरीर ने उसे “विदेशी” नहीं समझा। तीसरे दिन कुछ हल्का इम्यून रिस्पॉन्स दिखा, लेकिन वह भी बेहद मामूली था। यानी शरीर किडनी को अपनाने की कोशिश कर रहा था — यही इस शोध की सबसे बड़ी जीत है।
अभी लंबा रास्ता बाकी है, लेकिन दिशा साफ है…
वैज्ञानिक मानते हैं कि यह बस शुरुआत है। अगर एंटीजेंस पूरी तरह से न हटे, तो रिजेक्शन का खतरा रहता है। लंबे समय तक यह किडनी कैसे काम करेगी — यह जांचना बाकी है।
लिविंग पेशेंट्स पर ट्रायल शुरू होने में अभी कुछ साल लग सकते हैं, लेकिन अब मेडिकल साइंस के पास एक ठोस रास्ता है।
क्यों है ये खोज इतनी अहम
दुनिया भर में किडनी फेलियर के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है —
डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और लाइफस्टाइल डिजीज़ के कारण।
अकेले भारत में दो लाख से ज्यादा मरीज किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे हैं।
अगर यह यूनिवर्सल तकनीक सफल हो गई, तो डोनर्स की संख्या दोगुनी हो जाएगी और मौत की वेटिंग लिस्ट छोटी पड़ जाएगी।
विथर्स का संदेश
“यह रिसर्च सिर्फ लैब की दीवारों तक सीमित नहीं — अब बेसिक साइंस सचमुच मरीजों की जिंदगी बदलने जा रही है।”
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