डॉ. शिखा अग्रवाल की संवेदनशील लघुकथा ‘रावण दहन’ बताती है कि रावण का पुतला जलाने से अधिक जरूरी अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करना है।
‘मां, हम भी रावण दहन देखने जाएंगे। हमारे टीचर कहते हैं कि रावण दहन का अर्थ अपने अंदर की बुराइयों को ख़त्म करना है। हमारे स्कूल के सभी बच्चे जाते हैं’ घरों में काम करने वाली रामी की आठ साल की बेटी छुटकी और दस साल का बेटा सरजू ज़िद पकड़े हुए थे।
‘उस पुतले को जलते देख कर क्या करोगे, असल में तो रावण जैसे बुरे लोग खुलेआम घूम रहे हैं ‘ शाम का खाना बनाती थकीहारी रामी बड़बड़ाई। पर फिर भी बच्चों की खुशी के लिए उसने दशहरे मेले में जाने की हां कर दी।
जल्दी से खाना खा कर वो तीनों रावण दहन देखने चल पड़े। रामी ने छुटकी का हाथ कस कर पकड़ रखा था और वह सरजू को भी साथ चलने की हिदायत दे रही थी।
तभी भीड़ का रेला आया और छुटकी का हाथ छूट गया। रामी पागलों की तरह उसे तलाशने लगी। सरजू भी बुरी तरह घबरा गया। काफी देर तलाशने के बाद एक तरफ कुछ लोगों को इकठ्ठा देख कर रामी और सरजू उस और लपके। सचमुच ही वहां छुटकी बेसुध पड़ी थी और दो तीन लोग उस को होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। रामी ने किसी अनहोनी की आशंका से झपट कर छुटकी को गले लगा लिया। “घबराओ मत, ये बच्ची भगदड़ में फंस कर बेहोश हो गई थी, इसलिए इसे इधर ला कर हवा कर रहे थे”, वहां खड़े लोगों में से एक लड़के ने कहा।
सामने धूं धूं कर रावण जल रहा था, वहीं अपनी छुटकी को सही सलामत पा कर रामी को टीचर की कही बात पर विश्वास और गहरा हो गया कि रावण का दहन वास्तव में अंदर की बुराई को जलाना है।
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