हरियाणा के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की भारी कमी पर डीएमए इंडिया ने मुख्यमंत्री नायब सैनी, स्वास्थ्य मंत्री और NMC को ज्ञापन सौंपा। 750 पदों के मुकाबले 70-80 भर्ती की संभावना।
रोहतक/चंडीगढ़। हरियाणा के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों की कमी अब मेडिकल शिक्षा और मरीजों के इलाज दोनों पर भारी पड़ने लगी है। करीब 750 फैकल्टी पदों के मुकाबले हालिया संविदा भर्ती में महज 70-80 पद ही भरने की संभावना ने व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए इंडिया) ने इसे गंभीर स्थिति बताते हुए मुख्यमंत्री नायब सैनी, स्वास्थ्य मंत्री कुमारी आरती राव और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के सामने पूरा मामला रखा है।
डीएमए इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. शुभ प्रताप सोलंकी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. भानु कुमार और राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ सचिव डॉ. प्रियांशु शर्मा की ओर से विस्तृत ज्ञापन भेजा गया है। इसमें नियमित भर्ती में देरी से लेकर संविदा फैकल्टी के साथ वेतन और सेवा सुविधाओं में भेदभाव तक के मुद्दे उठाए गए हैं।
चार साल से नियमित भर्ती नहीं, डॉक्टर निजी संस्थानों की ओर निकल गए
डीएमए इंडिया का कहना है कि DMER/UHS रोहतक के अधीन पिछले चार वर्षों से नियमित फैकल्टी भर्ती नहीं हुई। वर्ष 2022 में निकली भर्ती अक्टूबर 2023 में पूरी हो सकी। भर्ती प्रक्रिया में हुई देरी के कारण बड़ी संख्या में योग्य MD/MS विशेषज्ञ निजी संस्थानों और दूसरे राज्यों का रुख कर गए।
अब हालिया संविदा भर्ती में लगभग 750 पदों के मुकाबले सिर्फ 70-80 पद भरे जाने की संभावना सामने आई है। संगठन के अनुसार, कम वेतन, सेवा सुरक्षा का अभाव और भविष्य की अनिश्चितता डॉक्टरों को संविदा नियुक्तियां स्वीकार करने से रोक रहे हैं।
कहीं 30-40 फीसदी पद खाली, कहीं स्थायी फैकल्टी लगभग नहीं
डीएमए इंडिया ने मेडिकल कॉलेजों की स्थिति का हवाला देते हुए बताया कि PGIMS रोहतक, KCGMC करनाल, BPS खानपुर और मेवात जैसे स्थापित संस्थानों में भी 30 से 40 प्रतिशत तक फैकल्टी पद खाली हैं।
वहीं SABV मेडिकल कॉलेज, छायसा (फरीदाबाद) में करीब 70 प्रतिशत फैकल्टी पद रिक्त बताए गए हैं। भिवानी, कोरियावास (नारनौल) और कुटेल मेडिकल यूनिवर्सिटी, करनाल में स्थायी फैकल्टी की स्थिति बेहद कमजोर है।
शिक्षक कम हुए तो असर MBBS से मरीजों तक
डीएमए इंडिया ने कहा कि फैकल्टी की कमी का असर केवल मेडिकल कॉलेजों के प्रशासन तक सीमित नहीं है। अनुभवी शिक्षकों के लगातार बाहर जाने से MBBS और PG छात्रों की पढ़ाई, थीसिस, रिसर्च और क्लिनिकल ट्रेनिंग प्रभावित हो रही है।
जटिल मरीजों के इलाज और सुपर-स्पेशियलिटी सेवाओं पर भी इसका असर पड़ रहा है। संगठन के मुताबिक फैकल्टी मानकों को पूरा करना भी मुश्किल होता जा रहा है, जिससे भविष्य में MBBS और PG सीटों के विस्तार पर असर पड़ सकता है।
डीएमए इंडिया ने यह भी सवाल उठाया कि सरकार जिन विशेषज्ञ डॉक्टरों को तैयार करने में संसाधन लगाती है, उनके दूसरे राज्यों और निजी क्षेत्र में चले जाने से उस निवेश का फायदा भी बाहर जा रहा है।
संविदा डॉक्टरों के लिए समान वेतन से लेकर PF-पेंशन तक की मांग
संगठन ने सभी स्वीकृत फैकल्टी पदों पर समयबद्ध और नियमित भर्ती शुरू करने की मांग की है। इसके साथ ही संविदा फैकल्टी के लिए समान कार्य के बदले समान वेतन लागू करने और नियमित भर्ती होने तक नियमित फैकल्टी के समान सेवा लाभ देने की मांग रखी गई है।
डीएमए इंडिया ने PF, पेंशन, ग्रेच्युटी, बीमा और दूसरी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं देने की मांग भी की है। इसके अलावा अर्जित अवकाश, मेडिकल लीव, मातृत्व-पितृत्व अवकाश, अकादमिक लीव और वेकेशन का लाभ देने की मांग की गई है।
संगठन पारदर्शी पदोन्नति और करियर प्रोग्रेशन नीति, अकादमिक, परीक्षा, शोध और प्रशासनिक कार्यों में समान अवसर तथा मेरिट आधारित नियमित नियुक्तियों की समयबद्ध व्यवस्था चाहता है।
फैकल्टी सरकारी मेडिकल कॉलेजों की रीढ़
डीएमए इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास ने कहा कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों की रीढ़ मजबूत फैकल्टी होती है। यदि सरकार जल्द नियमित भर्ती, सेवा सुरक्षा और बेहतर कार्य परिस्थितियां सुनिश्चित नहीं करती है तो हरियाणा में मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता, विशेषज्ञ डॉक्टरों का प्रशिक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर संकट में आ सकती है।
डीएमए इंडिया ने मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, एनएमसी और DMER हरियाणा से तत्काल हस्तक्षेप कर रिक्त पद भरने, नियमित भर्ती शुरू करने और संविदा फैकल्टी को सम्मानजनक सेवा सुरक्षा एवं समान अधिकार देने की मांग की है।
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