मोबाइल पर बैंक, लेकिन भरोसा अब भी कागज पर | सिर्फ इंक और पेपर पर बैंकों ने उड़ा दिए 4 हजार करोड़

डिजिटल बैंकिंग के दौर में भी भारतीय बैंकों ने FY2025 में प्रिंटिंग और स्टेशनरी पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए। जानिए किस बैंक ने सबसे ज्यादा खर्च किया और क्यों अब भी कागज पर टिकी है बैंकिंग व्यवस्था।

नई दिल्ली। ‘अब सब कुछ डिजिटल है… बैंक जाने की जरूरत नहीं…’ अगर आपने भी बैंक का यह विज्ञापन देखा है, तो अगली लाइन आपको चौंका सकती है।

देश के वही बैंक, जो ग्राहकों को पेपरलेस बैंकिंग का सपना दिखा रहे हैं, खुद स्याही, कागज और प्रिंटिंग मशीनों पर हर साल हजारों करोड़ रुपये बहा रहे हैं। हालिया वित्तीय आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ चुनिंदा बड़े बैंकों ने FY2025 में प्रिंटिंग और स्टेशनरी पर 4 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर डाले।यानि बाहर से बैंकिंग चाहे मोबाइल स्क्रीन में सिमट गई हो, लेकिन अंदर का पूरा पहिया अभी भी फाइलों, प्रिंटरों और कागजों पर ही घूम रहा है।

कागज़ पर ही सही…

सबसे ज्यादा पैसा किसने उड़ाया?

इस सूची में सबसे ऊपर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) है। देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक ने 986.4 करोड़ रुपये सिर्फ प्रिंटिंग और स्टेशनरी पर खर्च किए। यह रकम कई छोटे शहरों के पूरे साल के नगर निगम बजट से भी बड़ी है।

इसके ठीक पीछे एचडीएफसी बैंक रहा, जिसने 922.5 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। यानी सिर्फ दो बैंकों का स्टेशनरी बिल ही करीब 1909 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

रकम नहीं… यह आंकड़ा ज्यादा चौंकाता है

खर्च की रकम देखकर सबसे आगे SBI और HDFC हैं, लेकिन जब इसे नेट प्रॉफिट से जोड़कर देखा जाता है तो कहानी पूरी तरह बदल जाती है।

IDFC First Bank ने स्टेशनरी पर 122.7 करोड़ रुपये खर्च किए, जो उसके पूरे साल के नेट प्रॉफिट का 8.05% है।

IndusInd Bank का यह खर्च नेट प्रॉफिट का 4.46% रहा।

Yes Bank के लिए यही आंकड़ा 2.86%, जबकि AU Small Finance Bank के लिए 2.77% तक पहुंच गया।

दूसरी ओर SBI, PNB, बैंक ऑफ बड़ौदा, केनरा बैंक और यूनियन बैंक जैसे बड़े सरकारी बैंकों ने इस खर्च को अपने मुनाफे के मुकाबले काफी नियंत्रित रखा।

आखिर डिजिटल बैंकिंग में इतनी स्याही क्यों?

सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब बैंक हर सेवा को ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ले जा रहे हैं, तो फिर इतना खर्च किस बात का?

असल में लोन फाइलें, कानूनी दस्तावेज, ऑडिट रिकॉर्ड, KYC, नियामकीय अनुपालन, शाखाओं का रिकॉर्ड और लाखों ग्राहकों से जुड़े दस्तावेज आज भी बड़े पैमाने पर प्रिंट किए जाते हैं। यानी ग्राहक की बैंकिंग भले डिजिटल हो गई हो, लेकिन बैंक के बैक-ऑफिस में कागज का राज अब भी कायम है।

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