ठिठुरती शाम…

विश्वानि देव अग्रवाल, रिटायर्ड वरिष्ठ बैंक अधिकारी, बरेली


ठिठुरती शाम की हथेलियों में
धूप की आखिरी किरण काॅंपती है,
श्वासों की उठती भाप में
दिन की थकान झाॅंकती है।

गलियों की सुनसान चुप बातें
आती हैं सूरज के हिस्से,
खिड़कियों पर ठिठक-ठिठक
परछाईंयाॅं लिखती है किस्से।

चाय की भाप सी सरगोशियाँ
हवा में घुल जाती हैं,
और अलाव से सुलगते मौन में
झुलस कर मिट जाती हैं।

और शाम ठिठुरती हुई भी
जलाए रखती है भाषा की आग,
कि अंधेरा उतर जाए तो
कविता की रोशनी में चमकें राग।

सड़क पर बिखरी रोशनियां
अधूरे वाक्यों सी लगती हैं,
सपनों की विराम रेखा से
जिन्हें रात पूरा करती है।

शब्द, ठिठुरते होठों पर
गर्म सांस बनकर टिक जाते हैं,
क्योंकि बिना कहे बिना बताए
सारे लम्हे और ठंडे हो जाते हैं।

पेड़ों की टहनियाँ ठंड से नहीं
काॅंपती है बस इंतजार में,
कि कोई पंछी शायद लौट आए
एक सहारा बनकर भिनसार में।

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