योगेंद्र गुप्ता
भरतपुर। उत्तरी भारत की सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक साहित्यिक संस्था भरतपुर की हिंदी साहित्य समिति के नीलाम होने की नौबत आ गई है। क्या वाकई यह अब नीलाम हो जाएगी? कौन है इस स्थिति का जिम्मेदार? कौन बचाने आएगा इस संस्था को जिसे देश के मूर्धन्य साहित्यकारों ने यहां पधार कर इसे धन्य किया?
आज यह संस्था कर्मचारियों की पगार नहीं दे पा रही और राजस्थान सरकार इस संस्था को बचाने की कोई कोशिश नहीं कर रही। ऐसे में कर्मचारियों को वेतन देने के लिए कोर्ट ने इस साहित्यिक संस्था को नीलाम करने के आदेश दे दिए। आज इसकी नीलामी होनी थी लेकिन पर्याप्त खरीदार नहीं पहुंचे। नतीजतन नीलामी रुक गई।
ये हैं इस स्थिति के लिए जिम्मेदार
राजस्थान सरकार जिसने कभी उत्तरी भारत की इस इस प्राचीन साहित्यक संस्था हिंदी साहित्य समिति को बचाने की कोशिश नहीं की। वह चाहती तो इसे बचाने के लिए इसका अधिग्रहण कर सकती थी। वह प्रशासक बैठाकर सुधार सकती थी।
दूसरा जिम्मेदार है भरतपुर का जिला प्रशासन जिसने इस साहित्यिक संस्था को बचने की दिशा में आज तक सरकार तक कोई सही रिपोर्ट पहुंचाने की कोशिश नहीं की।
तीसरे जिम्मेदार हैं भरतपुर के सभी दलों के तमाम जनप्रतिनिधि और नगर निगम के पार्षद जिन्होंने इस विषय को कभी गंभीरता इसलिए नहीं लिया क्योंकि इससे उनको वोट नहीं मिल रहे थे। भरतपुर के जनप्रतिनिधियों का राजस्थान सरकार में अच्छा दखल रहा है।
चौथे जिम्मेदार हैं इस संस्था की कार्यकारिणी के सदस्य जिन्होंने केवल इस संस्था का पदाधिकारी बनने तक अपने आपको सीमित रखा। एक समय था जब इसकी कार्यकारिणी के सदस्य मकर संक्रांति के दिन संस्था के लिए पुस्तकों और नकद राशि का दान एकत्रित किया करते थे। संस्था का पदाधिकारी बनने के बाद अब उनके पास इस काम के लिए समय नहीं है। शहर के भामाशाह भी पहले दान करने आगे चल कर आते थे। लेकिन संस्था के पदाधिकारी कभी उनको इस कार्य के लिए प्रोत्साहित नहीं करते।
ये हैं वे मूर्धन्य जिन्होंने यहां आ कर इस संस्था को धन्य किया
- गौरीशंकर हीराचंद ओझा (1921)
- विश्व कवि गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगौर (1927)
- महामना पंडित मदनमोहन मालवीय (1927)
- राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन (1927)
- सेठ गोवंदिदास (1927 एवं 1968)
- बाबू गुलाबराय (1941)
डॉ. रामविलास शर्मा (1954)
- मोहनलाल सुखाडिय़ा पूर्व मुख्यमंत्री (1957)
- सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णनन पूर्व उपराष्ट्रपति (1961)
- मुराई नोबिस्ता, हिन्दी विद्वान जापान (1964)
- लोकनायक जयप्रकाश नारायण (1965)
- जैनेन्द्र कुमार, सुविख्यात कथाकार (1965)
- मोरारजी देसाई (1966)
- मन्मथनाथ गुप्त, अमर क्रांतिकारी (1968)
- आचार्य काका कालेलकर (1972)
- वियोगी हरि, गांधीवादी विचारक (1973)
- डॉ. प.अ. बारान्निकोव, रूसी हिन्दी विद्वान (1975)
- बी.डी. जत्ती, पूर्व उपराष्ट्रपति (1975)
- डॉ. विद्यानिवास मिश्र (1979)
- अली अहमद, नाटककार पाकिस्तान (1984)
- भीष्म साहनी, सुविख्यात कथाकार (1984)
- कमलेश्वर सुविख्यात कहानीकार (2004)
यह है मामला
संस्था के दो कर्मचारियों दाऊदयाल लाइब्रेरियन और त्रिलोकी नाथ क्लर्क ने मई 2003 से उनकी तनख्वाह नहीं मिलने का केस संस्था पर किया था। दोनों कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने अधिकारियों से शिकायत की, मंत्रियों को ज्ञापन दिए लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस पर दोनों ने साल 2008 में हाईकोर्ट में केस कर दिया। इसके बाद कोर्ट ने हिंदी साहित्य समिति के एक भाग को नीलाम कर उन्हें उनकी तनख्वाह दिलाने के आदेश दिए।
फ़रवरी 2014 में केस को भरतपुर की सिविल कोर्ट में आया जिस पर कोर्ट ने साल 2019 में हिंदी साहित्य समिति की कुर्की के आदेश निकाले। कुर्की के बाद हिंदी साहित्य समिति को नीलाम करने की कार्रवाई की गई लेकिन कोई भी बोली लगाने वाला व्यक्ति नहीं पहुंचा जिसके कारण हिंदी साहित्य समिति नीलाम नहीं हो सकी।
आज फिर से कोर्ट ने दोनों कर्मचारियों को साल 2003 से साल 2019 तक की तनख्वाह की राशि दिलाने के लिए नीलामी रखी, लेकिन आज सिर्फ एक व्यक्ति पहुंचा वह भी नीलामी की 25 प्रतिशत राशि जमा करवाने को तैयार नहीं था जिसके कारण नीलामी को भी स्थगित कर दिया गया।
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