गाजर का हलवा…

लघु कथा 

 डॉ.अलका अग्रवाल 


रामवती सुबह 7:00 बजे जब अपने घर से काम करने के लिए निकली, तब कुछ दूरी पर भी कोहरे के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। सर्दी से वह कांप रही थी ,उसने अपने शॉल को और कस कर लपेट लिया। लेकिन उसे तो बर्तन मांजने का काम इतनी ठंड में भी करना ही था। घर से निकलते वक्त ही छोटी बेटी ने कहा था ” मां पूरी सर्दी बीतने वाली है। इस बार अब तक गाजर का हलवा नहीं खाया।”

सच कह रही थी बेटी, बच्चों का मन तो करता ही है। उसकी आंखों के सामने भी गरमागरम ,नरम- नरम ,भाप उठते, मीठे और स्वादिष्ट ,घी, मावे और मेवों से भरा हलवा घूमने लगा। पिछले साल किसी के यहां शादी में खाया था।
सुबह से पांच घरों में काम कर चुकी है । हाथों की उंगलियां ठंडे पानी में सुन्न सी हो गई हैं और बिल्कुल बर्फ सी ठंडी । पांचो घरों में पता नहीं कैसे आज ही गाजर का हलवा बना है। कढ़ाइयां रगड़ते – रगड़ते हाथ भी दुखने लगे हैं । बेटी की हलवा खाने की इच्छा कैसे पूरी करे । गाजर तो सस्ती है, लेकिन दूध कैसे लाए ? इतनी मेहनत करने की शक्ति और इतना समय भी नहीं है उसके पास । रोज की रोटी- सब्जी और चाय मिल जाए सबको , वही क्या कम है ?पांच बच्चों के साथ गृहस्थी चलाना मजाक तो नहीं है। 

बाज़ार में तो हलवा इतना महंगा है कि वह सोच भी नहीं सकती । पति तो सिर्फ शराब पीकर और उसे पीट कर ,उससे पैसे छीन कर ही पति होने का कर्तव्य पूरा कर लेता है।मन मसोस कर रह गई वह। कैसी मां है वह…. ? अपने बच्चों की छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर पाती । उसकी आंखों से आंसू बह कर गालों पर पहुंच गए थे ।अब वह इस घर का काम करके घर जाने वाली थी। पर आश्चर्य ,…आज इस घर में भी गाजर का हलवा ही बना था । छठे घर में भी गाजर के हलवे की कढ़ाई पूरी शक्ति से रगड़ कर ,अब वह तन – मन से थकी हुई भारी कदमों से घर जा रही थी।

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