चेहरे …

यह लघु कहानी बताती है कि कैसे लोग प्रदूषण और ट्रैफिक पर चिंता जताते हैं, लेकिन अपने व्यवहार से उन्हीं समस्याओं को बढ़ावा भी देते हैं। समाज के दोहरे चेहरों पर तीखा व्यंग्य।

 डॉ. शिखा अग्रवाल, जयपुर  


‘इतने दिन हो गए इस शहर में तुम्हें आए, कभी तो घर से बाहर निकलो। मैं तो सोचती थी कि तुम्हारे आने के बाद अपने ग्रुप के साथ खूब विंडो शॉपिंग करेंगे, फिर किसी कैफे में कुछ खा पीकर घर लौटेंगे। पर तुम कभी कहीं जाने को तैयार ही नहीं होती’ उधर फ़ोन पर नेहा की फ्रेंड श्रेया थी। ‘सड़कों पर कितनी भीड़ रहती है मुझे रेंगते ट्रैफिक में थकान होने लगती है’ नेहा ने उत्तर दिया। ‘हां, शहर में ट्रैफिक तो काफी रहता है। पर खुद गाड़ी चला कर मत आओ, कैब ले लो। इरा, नैना और सत्या तो अपनी अपनी गाड़ी से आ रहीं हैं। हमें आश्चर्य इस बात का है कि तुम्हारा घर में दम नहीं घुटता’

ये वही श्रेया है जो परसों ही शहर में बढ़ रहे प्रदूषण पर ढेरों तर्क और समाधान के साथ भाषण दे कर आई थी और आज सिर्फ विंडो शॉपिंग के लिए बाजार घूमने पर जोर दे रही थी। हर व्यक्ति अकेले बिना किसी काम के गाड़ी ले कर घूमने निकल पड़ता है, फिर भीडभाड़ और प्रदूषण का रोना रोता है। ‘मेरा घर में दम नहीं घुटता श्रेया; दम घुटता है ट्रैफिक और प्रदूषण से। मैं भी अगर एक अलग गाड़ी लेकर आऊंगी तो शहर की दोनों समस्याओं में इजाफा ही करूंगी ना। इसलिए जरूरी काम होने पर ही बाहर जाती हूं।’ नेहा ने हंसते हुए बात समाप्त कर दी। पर देश की समस्याओं के प्रति लोगों के कितने चेहरे हैं यह सोच कर उस का मन व्यथित हो गया।

(लेखिका कॉलेज की सेवानिवृत्त सह आचार्य हैं)

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