बचपन से मुलाकात कर लेते हैं, दोस्तों से कही अनकही बात कर लेते हैं। उसके डब्बे से मैंने भी रोटी चुराकर खाई थी, ये बात उसको मैंने उसको कभी न बताई थी, कसर उसने भी कोई कम न रखी, मेरी मां की मिठाई उसने भी छुपाकर खाई थी, चलो बचपन से….।
पैन की स्याही से कोई कविता नहीं लिखी, छिड़क कर उसकी शर्ट पर बूंदे बनाई थी, फाड़ कर कई पन्ने मेरी कॉपी के, अपनी नाराजगी उसने भी दर्ज कराई थी। चलो बचपन से…
खो गया वो बचपन जवानी जब आई, बुढ़ापे की राह ने फिर उसकी याद दिलाई, चाय पर मिलते हैं मित्र सब पुराने अब, नई पीढ़ी में वही याद फिर मुस्कुराई है। चलो बचपन से फिर मुलाकात कर लेते है, दोस्तों से कही अनकही बात कर लेते हैं।
(लेखिका राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सीही सैक्टर 7 फरीदाबाद, हरियाणा में संस्कृत की प्रवक्ता हैं)