अपना घर बनाने का सपना, EMI का संघर्ष और बुढ़ापे की तन्हाई—आनन्द ‘अविरल’ की यह भावुक हिंदी कविता हर मिडिल क्लास परिवार की कहानी बयां करती है।
हर आम आदमी का होता है एक सपना
एक छत, एक आँगन, एक घर हो अपना।
जिसमें गुज़ारे ज़िंदगी अपने ही ढंग से
दिवाली की रौनक, होली के रंग से।
ना मकान मालिक की किचकिच
ना हर साल नया मकान देखने का काम हो।
गुलज़ार हो आंगन नाती-पोतों से,
जब जिंदगी की शाम हो।
और इस सपने के पीछे भागता है उम्र भर
कभी बिल्डरों के ऑफिस या दलाल के घर।
हर बार रह जाता है कुछ ना कुछ कम,
कभी बजट, कभी क्रेडिट स्कोर तो कभी इनकम।
और अंत में एक दिन जीत जाता है जंग
मिल जाता है एक फ्लैट, भले ही थोड़ा तंग।
जब ढूंढता है अपने घरोंदे में सुकून के दो पल
सामने आती है ईएमआई की पहेली,
जिसका ढूंढना है, हर महीने हल।
गुजरते हैं कुछ पल उस घरौंदे में, बस आते- जाते,
निकलती है जिंदगी ईएमआई की पहेली को सुलझाते सुलझाते।
और फिर उड़ जाते हैं परिंदे छूने को आकाश,
और रह जाता है वह अकेला
बँधा हुआ उस घर के खूंटे से।
हर पल राह देखती हैं आँखें
किसी अपने का इंतजार,
आख़िरी साँस तक पाले एक झूंठी सी आस।
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