ये ‘काश’ क्या है?

‘ये काश क्या है?’ एक ऐसी कविता है जो ‘काश’ शब्द के भीतर छिपी उम्मीद, अधूरे सपनों, जीवन की बेचैनी और मुस्कान के द्वंद्व को बेहद संवेदनशील ढंग से व्यक्त करती है। यह कविता पाठक को अपने जीवन के उन अनकहे एहसासों से जोड़ती है जिन्हें अक्सर सिर्फ एक शब्द—’काश’—बयां कर देता है।

करुणा जोशी, गांधीनगर, गुजरात

जीवन जीने की आस हो तुम,
जीवन में दबी सी खुशी का अहसास हो तुम।
‘काश’ रोमांचित होने का अरमान हो तुम।
जिंदगी की भागदौड़ में ये ‘काश’ पलभर को सही,
मगर जीवनंतता की अनुभूति हो तुम।

लेकिन ओ ‘काश’
ख्वाबों की अपूर्णता की  मोहर भी हो तुम।
वही ओ ‘काश’  मरे हुआ अरमानों का जनाजा भी हो तुम।
ओ ‘काश’ धमनियों में उबलता लहू भी हो तुम।
लेकिन वही ‘काश’
चेहरे पर हल्की सी हंसी की वजह भी तो हो तुम।
जहां ‘काश’ अपूर्ण जज्बातों का आईना तो हो तुम,
वही ‘काश’ बुदबुदाते अरमानों का बुलबुला भी तो हो तुम।

ए ‘काश; काश ना होकर,
इतने अजीब ना होकर,
हकीकत बन गए होते तुम…..
पर वो कैसे बनते?
क्यों कि ‘काश’ काश ही होना तुम..!

तब तो
आबाद हो तुम,
शास्वत हो तुम,
सत्य की छाव हो तुम,
अनश्वर अविनाशी   हो तुम,
बस ईश्वरीय अनुभूति का साज भी हो तुम।
अजीब तो जरूर हो पर आबाद हो तुम
आबाद हो तुम।

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