राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के वोट प्रतिशत में सिर्फ 0.94% का अंतर रहा। 309 में 145 निकायों में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। जानिए निकाय चुनाव के नतीजों ने दोनों दलों और निर्दलीयों के सामने कौन से सवाल खड़े किए।
राजस्थान में हुए निकाय चुनाव के परिणाम चाहे भाजपा के अनुकूल नहीं रहे हों, लेकिन ज्यादातर नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं में महापौर, सभापति और चेयरमैन बनाकर भाजपा आत्ममुग्ध है, जो उसके लिए खुश होने या आत्मसंतोष कर लेने की बात नहीं कही जा सकती, बल्कि उसे आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर जनता ने सीधे-सीधे उसे ज्यादातर जगह बहुमत से वंचित क्यों रखा? उधर, इन हालातों में कांग्रेस को भी आरोपों की राजनीति करने के बजाए यह सोचना चाहिए कि जनता ‘हाथ’ के साथ खड़ी क्यों नहीं हुई? प्रदेश की जनता-जर्नादन ने बहुतायत में इस बार अपने वार्डों की कमान निर्दलियों को सौंपी है, लेकिन उनके किसी भी पार्टी (भाजपा या कांग्रेस) के बाड़ेबंदी से दूर रहने की दरकार थी, लेकिन अब उन्हें भी यह चिंतन करना चाहिए कि प्रभाव या प्रलोभन में बहने के बजाए वे खुद को तटस्थ क्यों नहीं रख पाए?
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स्थानीय निकायों के इस चुनाव को वर्ष 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले शहरी राजनीति के मिजाज की परीक्षा के तौर पर देखा गया। इसमें भाजपा को 35.30 तो कांग्रेस को 34.36 प्रतिशत वोट मिले। दोनों दलों के बीच वोटों का अंतर मात्र 0.94 प्रतिशत रहा। वहीं निर्दलियों को 27.47 प्रतिशत वोट मिले। क्षेत्रीय व अन्य छोटे दलों में आरएलपी को 0.95, आप को 0.47, माकपा को 0.32, बसपा को 0.29 और आदिवासी पार्टी बाप को महज 0.13 प्रतिशत वोट पाकर ही आत्मसंतोष करना पड़ा। इस लिहाज से कांग्रेस वोट प्रतिशत में भाजपा के बेहद करीब रही है। राजनीतिक पेच यह है कि 309 में से 145 निकायों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। इनमें भाजपा को 85 तो कांग्रेस को मात्र 45 निकायों में ही बहुमत मिल पाया।
स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों में टिकट वितरण में रहीं खामियां या बरती गई गड़बडिय़ां भी भाजपा व कांग्रेस पर भारी पड़ी हंै। राजस्थान में बहुतेरे वार्ड ऐसे रहे, जहां बागी होकर निर्दलीय लड़े उम्मीदवारों ने पार्टी प्रत्याशियों की बाट लगा दी। हालांकि बगावत कर जीते ऐसे उम्मीदवारों में से बहुत को पार्टियों ने अपने पक्ष में मना लिया, लेकिन इसके लिए पार्टियों को खूब पसीना बहाना पड़ा।
नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं में हुए महापौर, सभापति व पालिकाध्यक्ष के अभी तक घोषित 302 स्थानीय निकाय के चुनाव परिणाम में हालात यह है कि इनमें भाजपा को 198, कांग्रेस को 94, निर्दलीयों को 7 और आप, माकपा व आरएलपी को एक-एक सीट मिली है। इसमें एक साथ भाजपा के छंलाग लगाने का कारण केवल पाटियों की मेहनत नहीं, बल्कि इसके पीछे सत्ता की ताकत भी रही है। भाजपा सरकार के प्रभाव का ही नतीजा माना जा रहा है कि निर्विरोध हुए 32 निकायों के चुनाव के नतीजों में से ज्यादातर भाजपा के पक्ष में रहे। इनमें भरतपुर व डीग जिले में संख्या ज्यादा रही।
निकाय चुनाव के शुरू होने से अभी तक प्रमुख दल भाजपा व कांग्रेस की ओर से आरोप-प्रत्यारोप के दौर सतत जारी है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो सत्ता के प्रभाव की कहानी बखूबी बयां कर रहे हैं। कई जगह चुनाव को लेकर हाईकोर्ट को दखल देना पड़ा है। तिजारा नगर परिषद में सभापति के चुनाव को लेकर हुए घटनाक्रम से सत्ता की जमकर किरकिरी हुई, जहां पूरा तिजारा एकजुट नजर आया और आखिर वहां हाईकोर्ट के दखल के बाद जनता की जीत हुई। इसी तरह हनुमानगढ़ में निर्दलीय विधायक की गिरफ्तारी के बाद विधायक गुट का ही बोर्ड बना। इसी तरह बारां में आप, नोखा में माकपा तो मुंडवा में आरएलपी का बोर्ड बना।
निकाय चुनाव में क्रॉस वोटिंग ने भी कई जगह प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा व कांग्रेस का समीकरण बिगाड़ा और उनका बहुमत का गणित धरा रह गया। बीकानेर, नागौर, बाड़मेर, सिरोही, बालोतरा, अजमेर, अनूपगढ़, पिण्ड़वा, आबूरोड व इटावा आदि में अपनों ने पार्टियों का खेल खराब कर डाला। दोनों ही दल सेंधमारी जैसी बीमारी से अछूते नहीं रहे। नजीजन, जिस दल के पास बहुमत था, उसके हाथ से कुर्सी निकल गई और कम पार्षदों वाली पार्टी बोर्ड बनाने में कामयाब हो गई। लब्बोलुआव यह कि वार्ड पार्षद के चुनाव में चाहे कारण कुछ भी रहे हों, लेकन दोनों ही प्रमुख पार्टियां जनता से हार गईं, लेकिन मेयर, सभापति व चैयरमैन के चुनाव में सरकारी दखल जनता के फैसले पर भारी पड़ गया और इस तरह सत्ता जीत गई।
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