केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में पानी की कमी के बीच 13 न स्कीम में 70 से अधिक प्रजातियों के पक्षियों का जमावड़ा है। दीपक मुदगल ने पानी घना तक पहुंचाने की मांग उठाई।
भरतपुर। विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में पानी की कमी के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो जल प्रबंधन पर सवाल खड़े कर रही है। उद्यान में पानी का संकट है और इसी वजह से हजारों देशी-विदेशी पक्षी बाहर निकलकर अटलबंध बांध में विकसित 13 न स्कीम के जलभराव क्षेत्र में पहुंच रहे हैं। यहां उन्हें भोजन और आश्रय मिल रहा है। लेकिन जिस पानी ने इन पक्षियों को नया ठिकाना दिया है, वही पानी अब सीएफसीडी नाले में छोड़ा जा रहा है।
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के निकट गणेश मंदिर के पीछे स्थित इस जलभराव क्षेत्र ने अब महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि का रूप ले लिया है। यहां पक्षियों की 70 से अधिक प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की जा रही है। हजारों की संख्या में पक्षियों का जमावड़ा इस बात का संकेत है कि पानी और भोजन की उपलब्धता ने इस क्षेत्र को उनके लिए अनुकूल बना दिया है। ऐसे में यहां से पानी की निकासी जलीय पक्षियों के लिए संकट खड़ा कर सकती है।
वन्यजीव फोटोग्राफर एवं प्रकृति प्रेमी दीपक मुदगल ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए प्रशासन से सवाल उठाया है कि जब एक ओर घना पानी की कमी से जूझ रहा है और उसके पक्षी बाहर आकर इसी जलभराव क्षेत्र में जीवनयापन कर रहे हैं, तो यहां उपलब्ध पानी को नाले में बहाने के बजाय उद्यान तक पहुंचाने की पहल क्यों नहीं की जा रही?
मुदगल ने सुझाव दिया है कि पहले इस पानी की गुणवत्ता की जांच कराई जाए और उपयुक्त पाए जाने पर इसे केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान तक पहुंचाया जाए। उनका कहना है कि बाहर से आने वाले पक्षियों की बड़ी संख्या और यहां उनकी भोजन संबंधी गतिविधियां इस जलक्षेत्र के महत्व को दर्शाती हैं।
पांचाना से पानी की मांग के बीच सामने आया दूसरा रास्ता
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए घना प्रशासन पिछले कई वर्षों से पांचाना बांध से पानी लाने की मांग उठाता रहा है। इस प्रयास में शहर के गणमान्य नागरिकों ने भी भागीदारी निभाई, लेकिन अब तक अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके हैं। ऐसे में दीपक मुदगल ने 13 न स्कीम में उपलब्ध पानी को उद्यान तक पहुंचाने को एक व्यावहारिक और त्वरित विकल्प बताया है।
मुदगल ने घना प्रशासन और जिला प्रशासन से आपसी समन्वय के साथ इस दिशा में कदम उठाने की अपील की है। उनके मुताबिक, पानी को सीएफसीडी नाले में बहाने के बजाय उसका उपयोग केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की जरूरत पूरी करने में किया जा सकता है। इससे जलभराव क्षेत्र पर निर्भर पक्षियों को भी राहत मिलेगी और उद्यान में पानी की कमी से पैदा हो रही परेशानी कम करने में मदद मिल सकती है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस सुझाव पर पानी की गुणवत्ता की जांच और उसे उद्यान तक पहुंचाने की संभावनाओं पर क्या कदम उठाता है।
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