गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) में हैरान करने वाला खुलासा—जिस व्यक्ति के नाम पर मुआवजे का केस चल रहा था, उसकी 2015 में ही मौत हो चुकी थी। 11 साल बाद अदालत में सामने आया सच।
अहमदाबाद
कोर्ट में सब कुछ लगभग तय था। बहस पूरी हो चुकी थी, फाइल बंद होने ही वाली थी और फैसला आने की घड़ी भी करीब थी। तभी जज ने एक साधारण-सा निर्देश दिया—’अगली तारीख पर अपने क्लाइंट को वीडियो कॉल पर पेश कीजिए।’ बस, यहीं से कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि अदालत में बैठे लोग भी कुछ पल के लिए सन्न रह गए।
जब अदालत में खुला 11 साल पुराना राज
यह मामला 2003 के एक सड़क हादसे से जुड़ा है। वडोदरा में IPCL के कर्मचारी मकवाणा अपनी बाइक से डाकोर जा रहे थे। रास्ते में पीछे से आए एक ट्रक ने जोरदार टक्कर मार दी। हादसा इतना भयानक था कि बाइक पर पीछे बैठे व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि मकवाणा गंभीर रूप से घायल होकर लकवाग्रस्त हो गए। बाद में उन्हें नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेनी पड़ी इसके बाद उन्होंने मुआवजे के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
10 लाख से 37 लाख तक पहुंचा मामला
2012 में मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने मकवाणा को 10.44 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। लेकिन मकवाणा को यह रकम कम लगी, इसलिए उन्होंने मुआवजा बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट में अपील कर दी। साल दर साल सुनवाई चलती रही और मामला आखिरकार अंतिम दौर में पहुंच गया। अदालत अब मुआवजा बढ़ाकर करीब 37.24 लाख रुपये करने पर विचार कर रही थी।
एक आदेश और पूरी कहानी पलट गई
फैसला आने से ठीक पहले अदालत ने वकील से कहा कि वह अपने क्लाइंट को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश करें। जब अगली तारीख आई तो वकील ने अदालत को बताया कि वह अपने क्लाइंट से संपर्क नहीं कर पा रहा था। फिर उसने जो कहा, उसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी—
मकवाणा की मौत तो 23 अगस्त 2015 को ही हो चुकी है। यानी अदालत करीब 11 साल तक एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर सुनवाई करती रही, जो इस दुनिया में ही नहीं था।
जजों ने जताई कड़ी नाराजगी
मामले की सुनवाई कर रही बेंच—जस्टिस संगीता विशेन और जस्टिस निशा ठाकोर—ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि इतनी महत्वपूर्ण जानकारी समय पर अदालत को न देना बेहद गंभीर चूक है और इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।
अब वारिसों को मिलेगा मुआवजा
कोर्ट ने तुरंत मृतक के दो बेटों और दो बेटियों को मामले में कानूनी वारिस के रूप में शामिल करने का आदेश दिया है। अब बढ़ी हुई 37.24 लाख रुपये की मुआवजा राशि इन्हीं को दी जाएगी। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मृतक की पत्नी का निधन 2019 में हो चुका है। साथ ही संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि सभी कानूनी वारिसों का पता लगाकर उन्हें केस में पक्षकार बनाया जाए।
सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक सवाल अदालत के बाहर भी चर्चा में है— अगर जज ने वीडियो कॉल पर पेश करने का आदेश नहीं दिया होता, तो क्या यह राज कभी सामने आता?
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