राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय या न्यायिक कार्यवाही लंबित होने मात्र से सेवानिवृत्त कर्मचारी को नियमों के तहत प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी से वंचित नहीं रखा जा सकता।
जोधपुर। सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच या न्यायिक कार्यवाही लंबित है, तो क्या उसे प्रोविजनल पेंशन और ग्रेच्युटी के लिए भी इंतजार करना पड़ेगा? राजस्थान हाईकोर्ट के एक अहम फैसले ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा कि केवल विभागीय या न्यायिक कार्यवाही लंबित होने के आधार पर सेवानिवृत्त कर्मचारी को नियमों के तहत मिलने वाली प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी से वंचित नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दस्तावेज मिलने के बाद 60 दिन के भीतर प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी जारी करने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। यह फैसला उन सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनके पेंशन संबंधी लाभ विभागीय कार्यवाही या दस्तावेजों की पूर्ति के सवाल पर अटके हुए हैं। हालांकि, इस आदेश को सभी परिस्थितियों में स्वतः लागू होने वाला निर्देश नहीं माना जा सकता; लाभ संबंधित सेवा नियमों और मामले की परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित होंगे।
विभागीय जांच के नाम पर पेंशन रोकने का मामला फिर चर्चा में
सरकारी कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और ग्रेच्युटी आर्थिक सुरक्षा के अहम साधन हैं। ऐसे में विभागीय कार्यवाही लंबित रहने पर इन लाभों का भुगतान अटकना कर्मचारी के लिए गंभीर परेशानी बन सकता है। राजस्थान हाईकोर्ट के सामने भी ऐसा ही मामला आया, जिसमें एक सेवानिवृत्त अधिकारी को चार्जशीट और रिकवरी आदेश से जुड़े विवाद के बीच प्रोविजनल पेंशन तथा ग्रेच्युटी नहीं मिली थी। कोर्ट ने संबंधित पेंशन नियमों पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि कार्यवाही लंबित होना अपने आप में इन निर्धारित लाभों से पूरी तरह वंचित रखने का आधार नहीं बन सकता।
क्या कहता है पेंशन नियमों का प्रावधान?
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के नियम 90 और राज्य सरकार की 12 अक्टूबर 2021 की अधिसूचना का हवाला दिया गया। उनका तर्क था कि विभागीय या न्यायिक कार्यवाही लंबित रहने की स्थिति में भी नियमों के तहत प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी का लाभ दिया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और संबंधित नियमों पर विचार करते हुए याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता ने जरूरी दस्तावेज पहले जमा नहीं किए हैं, तो उन्हें तुरंत उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद संबंधित अधिकारियों को लागू नियमों और अधिसूचना के अनुसार भुगतान की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
60 दिन की समय-सीमा, लेकिन दस्तावेज भी जरूरी
कोर्ट ने अधिकारियों को आवश्यक दस्तावेज मिलने के बाद 60 दिन के भीतर प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी जारी करने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। इसका अर्थ है कि इस मामले में दस्तावेजों की पूर्ति और संबंधित नियमों के अनुसार कार्रवाई महत्वपूर्ण रहेगी।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए इस फैसले का मुख्य संदेश यह है कि पेंशन संबंधी लाभों पर निर्णय लेते समय लागू नियमों का पालन जरूरी है। केवल जांच लंबित होने का हवाला देकर प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी को अनिश्चितकाल तक रोके रखने का सवाल न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।
आखिर किस मामले में आया यह फैसला?
यह मामला राजस्थान सरकार के सहकारिता विभाग में अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी रहे अर्जुन सिंह चारण की याचिका से जुड़ा है। वे 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हुए थे। उनके अनुसार, रिटायरमेंट के दिन ही राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 16 के तहत उन्हें चार्जशीट दी गई थी।
चारण ने चार्जशीट को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिस पर 20 जनवरी 2026 को रोक लगाई गई। इसके बाद विभाग ने 7 अप्रैल 2026 को रिकवरी का आदेश जारी किया। इस आदेश के आधार पर वसूली करने पर भी हाईकोर्ट ने 21 अप्रैल 2026 को रोक लगा दी। इसके बावजूद प्रोविजनल पेंशन और ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं होने पर उन्होंने नई याचिका दायर की।
राज्य सरकार ने सुनवाई में दलील दी कि विभागीय कार्यवाही लंबित है और जरूरी दस्तावेज भी जमा नहीं किए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अवर दान उज्ज्वल ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल आई.आर. चौधरी और अधिवक्ता विक्रम चौधरी पेश हुए।
कर्मचारियों के लिए फैसले का व्यावहारिक महत्व क्या है?
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि विभागीय या न्यायिक कार्यवाही लंबित होने की स्थिति में सेवानिवृत्त कर्मचारी के प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी संबंधी अधिकारों पर लागू नियमों के अनुरूप विचार करना होगा। कर्मचारी के मामले में जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।
ध्यान देने वाली बात: हाईकोर्ट ने इस मामले में पूरी नियमित पेंशन या पूरी ग्रेच्युटी जारी करने का आदेश नहीं दिया है। राहत प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी तक सीमित है। इसलिए इस फैसले का व्यापक महत्व समझते समय इसी कानूनी सीमा को ध्यान में रखना जरूरी है।
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