हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि वरिष्ठ कर्मचारी को उसके कनिष्ठ से कम वेतन नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि वेतन विसंगति होने पर विभाग को स्टेपिंग अप करना होगा और सेवानिवृत्ति इसका आधार नहीं बन सकती।
शिमला। सरकारी कर्मचारियों के वेतन और वरिष्ठता से जुड़े मामलों में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई वरिष्ठ कर्मचारी अपने ही कनिष्ठ कर्मचारी से कम वेतन पा रहा है, तो यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है। ऐसी विसंगति सामने आने पर विभाग को वेतन का ‘स्टेपिंग अप’ कर समानता सुनिश्चित करनी होगी। इतना ही नहीं, कर्मचारी के सेवानिवृत्त हो जाने का आधार बनाकर भी विभाग इस अधिकार से इनकार नहीं कर सकता।
यह फैसला उन हजारों कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो वर्षों तक वेतन असमानता की शिकायत करते रहे हैं।
वरिष्ठ थे, फिर भी वेतन मिला कम
मामला राज्य बिजली बोर्ड के पूर्व अधिकारी एमके सूद से जुड़ा है। उन्होंने बिजली बोर्ड के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया।
रिकॉर्ड के अनुसार एमके सूद ने 1969 में बिजली बोर्ड में ऑइलर एंड क्लीनर के रूप में सेवा शुरू की। इसके बाद वे 1971 में सब स्टेशन अटेंडेंट (SSA) बने, 1983 में जूनियर इंजीनियर पद पर पदोन्नत हुए और आगे चलकर असिस्टेंट इंजीनियर के पद तक पहुंचे।
दूसरी ओर परशोत्तम राम की नियुक्ति 1975 में सीधे सब स्टेशन अटेंडेंट के रूप में हुई थी और वे भी बाद में जूनियर इंजीनियर बने। सेवा रिकॉर्ड के अनुसार एमके सूद हर स्तर पर परशोत्तम राम से वरिष्ठ थे।
विसंगति का पता वर्षों बाद चला
दोनों अधिकारियों की अलग-अलग स्थानों पर तैनाती होने के कारण एमके सूद को वर्ष 2003 में पता चला कि उनसे कनिष्ठ कर्मचारी का वेतन उनसे अधिक हो गया है। उन्होंने इसकी शिकायत बिजली बोर्ड से की, लेकिन विभाग ने 25 मई 2006 को यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि उन्होंने समय पर आवश्यक विकल्प का चयन नहीं किया था।
बाद में 29 फरवरी 2008 को एमके सूद सेवानिवृत्त हो गए। इसके कुछ महीने बाद बोर्ड ने 17 अक्टूबर 2008 को एक और आदेश जारी कर उनका दावा पूरी तरह समाप्त कर दिया। विभाग का तर्क था कि अब वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए वेतन संशोधन का उनकी पेंशन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
हाईकोर्ट ने विभाग की दलील नहीं मानी
हाईकोर्ट ने विभाग की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी वरिष्ठ कर्मचारी को उसके कनिष्ठ से कम वेतन मिल रहा है तो विभाग की जिम्मेदारी है कि ‘स्टेपिंग अप’ के जरिए वेतन विसंगति को दूर करे। यह अधिकार केवल इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि कर्मचारी अब सेवा में नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वेतन निर्धारण में समानता और वरिष्ठता के सिद्धांतों का पालन करना प्रशासन की जिम्मेदारी है और विभाग तकनीकी आधारों पर कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों से इनकार नहीं कर सकता।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह निर्णय उन कर्मचारियों के लिए राहत का आधार बन सकता है, जिन्हें पदोन्नति, वेतन निर्धारण या वेतनमान में बदलाव के बाद अपने कनिष्ठ कर्मचारियों से कम वेतन मिलने की शिकायत रही है। हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि वरिष्ठता केवल पद तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका प्रभाव वेतन पर भी समान रूप से दिखना चाहिए।
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