भारत में चीनी की बढ़ती कीमतों पर ISMA ने कहा कि देश में कोई कमी नहीं है। संगठन के मुताबिक बाजार की धारणा और घबराहट में खरीदारी से दाम बढ़े हैं और अगले 2-3 हफ्तों में राहत मिल सकती है।
नई दिल्ली। रसोई में चीनी महंगी हुई तो सवाल उठने लगा—क्या देश में स्टॉक कम पड़ रहा है? क्या आने वाले दिनों में दाम और चढ़ेंगे? चीनी उद्योग संगठन ISMA ने इन दोनों आशंकाओं पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है। संगठन का दावा है कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है और अगले कुछ हफ्तों में कीमतों में नरमी दिखाई दे सकती है।
यानी पिछले 15-20 दिनों में जो तेजी दिखी, उसे उद्योग वास्तविक आपूर्ति संकट नहीं मान रहा। इसके पीछे घबराहट में खरीदारी, बाजार की अटकलें, उत्पादन को लेकर बनी धारणा और वैश्विक कीमतों में उछाल को बड़ा कारण बताया जा रहा है।
बाजार में डर बढ़ा, खरीदारी बढ़ी और दाम ऊपर चले गए
ISMA के महानिदेशक दीपक बल्लानी के मुताबिक हाल की तेजी एक साथ कई वजहों से बनी। बाजार में सट्टेबाजी और घबराहट वाली खरीदारी ने कीमतों को सहारा दिया। इसके साथ उत्तर प्रदेश में लाल सड़न रोग और गन्ने में समय से पहले फूल आने की वजह से पिछले साल उत्पादन उम्मीद से कम रहा। इससे बाजार में यह धारणा बनी कि आगे आपूर्ति पर दबाव आ सकता है।
उधर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की उपलब्धता कम रहने से कीमतें ऊपर गईं। उसका असर भारतीय बाजार की धारणा पर भी पड़ा। लेकिन ISMA का कहना है कि धारणा और वास्तविक उपलब्धता दो अलग बातें हैं।
279 लाख टन उत्पादन, फिर कमी किस बात की?
ISMA के मुताबिक मौजूदा चीनी सीजन में देश का शुद्ध उत्पादन करीब 279 लाख टन रहने का अनुमान है। दक्षिण कर्नाटक और तमिलनाडु में चल रहे विशेष पेराई सीजन से भी उत्पादन को अतिरिक्त सहारा मिल रहा है। संगठन का दावा है कि 30 सितंबर को सीजन समाप्त होने तक देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहेगी। ISMA के प्रेसिडेंट नीरज शिरगांवकर ने भी कहा है कि मौजूदा स्टॉक मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त है और नया सीजन शुरू होने तक भी देश के पास मजबूत बफर बना रहेगा।
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35 लाख टन का स्टॉक, फिर घबराने की जरूरत क्यों?
शिरगांवकर के मुताबिक 2025-26 सीजन के अंत में करीब 35 लाख टन क्लोजिंग स्टॉक रहने का अनुमान है। उद्योग संगठन इसे घरेलू मांग के मुकाबले मजबूत बफर मान रहा है। उनका कहना है कि भारत में उत्पादन और भंडारण दोनों संतोषजनक स्तर पर हैं। इसलिए जो कमी का माहौल दिखाई दे रहा है, वह किसी संरचनात्मक आपूर्ति संकट का संकेत नहीं है। त्योहारी सीजन से पहले बाजार में बनी धारणा को मौजूदा तेजी की बड़ी वजह माना जा रहा है।
खुदरा बाजार को कब मिलेगी राहत?
यहीं उपभोक्ताओं के लिए सबसे अहम बात सामने आई है। ISMA का कहना है कि कीमतों में नरमी के शुरुआती संकेत पहले से दिख रहे हैं। नीरज शिरगांवकर के अनुसार पिछले 2-3 दिनों में कुछ सुधार दिखाई दिया है और जैसे-जैसे चीनी खुदरा बाजार में पहुंचेगी, अगले 2-3 हफ्तों में बेहतर स्थिति देखने को मिल सकती है। यानी थोक बाजार में नरमी का असर अगर आगे बढ़ा तो उसकी सीधी झलक उपभोक्ताओं को खुदरा कीमतों में मिल सकती है।
इथेनॉल पर डालकर चीनी महंगाई की कहानी सही नहीं?
चीनी की कीमत बढ़ने के बीच इथेनॉल कार्यक्रम पर भी सवाल उठते रहे हैं। लेकिन ISMA के उपाध्यक्ष माधव बी. श्रीराम इससे सहमत नहीं हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जब इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम शुरू हुआ था, तब कुल इथेनॉल आपूर्ति में चीनी उद्योग की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत थी। अब यह घटकर लगभग 28 प्रतिशत रह गई है।
उनके मुताबिक सरकार की प्राथमिकता भी स्पष्ट है—पहले घरेलू उपभोक्ताओं के लिए चीनी, फिर इथेनॉल मिश्रण और उसके बाद निर्यात। ऐसे में इथेनॉल उत्पादन को मौजूदा चीनी कीमतों की कमी का सीधा कारण बताना उचित नहीं होगा।
अब नजर खुदरा बाजार पर
उद्योग का संदेश सीधा है—गोदाम खाली नहीं हैं, उत्पादन कमजोर नहीं पड़ा है और सप्लाई टूटने जैसी स्थिति नहीं है।
अब असली परीक्षा यह होगी कि अगले कुछ हफ्तों में यह दावा बाजार में कितना दिखाई देता है। अगर चीनी की आवक बढ़ती है और कीमतों में नरमी आती है, तो फिलहाल की तेजी को बाजार की घबराहट माना जाएगा। लेकिन अगर दाम नीचे नहीं आते, तो फिर स्टॉक और सप्लाई को लेकर सवाल दोबारा उठेंगे।
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