राजकीय महाविद्यालय जयपुर में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM) द्वारा कर्तव्य बोध दिवस मनाया गया। स्वामी राघवेंद्र आचार्य ने कर्तव्य और नैतिक शिक्षा पर विचार रखे।
जयपुर
जब शिक्षा केवल डिग्री तक सिमट जाए, तब समाज दिशा भटकने लगता है—और जब शिक्षक अपने कर्तव्य को जीवन का संस्कार बना लें, तब पीढ़ियाँ संवरती हैं। इसी विचार को केंद्र में रखकर बुधवार को राजकीय महाविद्यालय जयपुर में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (उच्च शिक्षा, राजस्थान) की स्थानीय इकाई द्वारा कर्तव्य बोध दिवस मनाया गया। यह दिवस परंपरागत रूप से स्वामी विवेकानंद जयंती (12 जनवरी) और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती (23 जनवरी) के मध्य आयोजित किया जाता है।
कार्यक्रम के मुख्य पाथेय वक्ता परम पूज्य स्वामी राघवेंद्र आचार्य महाराज, युवाचार्य गलता पीठ रहे। अपने ओजस्वी उद्बोधन में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जीवन की अधिकांश समस्याएं कर्तव्य को न पहचानने से जन्म लेती हैं। जब व्यक्ति अपने दायित्व को समझकर आचरण करता है, तो जीवन स्वतः संतुलित और उद्देश्यपूर्ण बन जाता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ हुआ। सरस्वती वंदना का भावपूर्ण प्रस्तुतीकरण प्रोफेसर ओम प्रकाश पारीक ने किया। कार्यक्रम की प्रस्तावना इकाई सचिव प्रोफेसर गोविंद शरण शर्मा ने रखते हुए कर्तव्य बोध दिवस की पृष्ठभूमि और उद्देश्य को रेखांकित किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कार्यवाहक प्राचार्य प्रोफेसर रणजीत सिंह राठौड़ ने कहा कि शिक्षक का दायित्व केवल विषयवस्तु पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने संगठन के उद्देश्यों, कार्यप्रणाली और शैक्षिक गतिविधियों पर भी प्रकाश डाला।
इस अवसर पर महाविद्यालय के वरिष्ठ संकाय सदस्य प्रोफेसर जयदीप सिंह, प्रोफेसर पप्पू लाल गुप्ता सहित समस्त शैक्षणिक एवं अशैक्षणिक स्टाफ की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. ललित शर्मा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रजनी मीणा द्वारा प्रस्तुत किया गया।
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