मैदान अधूरा, सुविधाएं सीमित और उम्मीदें पदक की… ऐसे कैसे तैयार होंगे राजस्थान के चैंपियन?

राजस्थान की 70वीं विद्यालयी खेलकूद प्रतियोगिताओं के बीच स्कूलों में खेल मैदान, शारीरिक शिक्षक, प्रशिक्षण, पोषाहार और टीए-डीए की व्यवस्थाओं पर वरिष्ठ खेल पत्रकार संजीव चीनियां का विश्लेषण।

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संजीव चीनिया, वरिष्ठ खेल पत्रकार

राजस्थान में सत्र 2026-27 की 70वीं जिला एवं राज्य स्तरीय विद्यालयी खेलकूद प्रतियोगिताएं चल रही हैं। शिक्षा विभाग के आधिकारिक खेल पोर्टल पर 11, 14, 17 और 19 वर्ष आयु वर्गों की जिला एवं राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं का कार्यक्रम भी दर्ज है। हर साल की तरह इस बार भी हजारों विद्यार्थी इन प्रतियोगिताओं के जरिए अपनी खेल प्रतिभा दिखाने मैदान में उतर रहे हैं। लेकिन सवाल प्रतियोगिताओं के आयोजन से आगे का है—क्या हमारे स्कूलों में वह पूरा माहौल मौजूद है, जिसमें कोई बच्चा खिलाड़ी बन सके?

किसी खिलाड़ी की यात्रा जिला स्तर की प्रतियोगिता के दिन शुरू नहीं होती। उसकी तैयारी महीनों और वर्षों पहले शुरू होनी चाहिए। जिस बच्चे में दौड़ने की प्रतिभा है, उसे रोज अभ्यास का मौका चाहिए। जिसे कबड्डी, कुश्ती, फुटबॉल, हॉकी या किसी दूसरे खेल में आगे बढ़ना है, उसे उसी खेल के अनुकूल मैदान, उपकरण और प्रशिक्षित मार्गदर्शन चाहिए। केवल प्रतियोगिता की तारीख तय कर देने से खिलाड़ी तैयार नहीं होते।

खिलाड़ी तैयार करे कौन, जब स्कूल का मैदान ही तैयार नहीं?

विद्यालयी खेल व्यवस्था की सबसे पहली जरूरत खेल मैदान है। हर विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या, उपलब्ध जमीन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खेल मैदान विकसित होना चाहिए। लेकिन कई जगह मैदान है तो वह खेल के लिए तैयार नहीं, और कहीं जमीन की कमी के कारण विद्यार्थियों को पर्याप्त अभ्यास का अवसर ही नहीं मिलता।

मैदान का समतलीकरण, खेल उपकरण, सुरक्षा और नियमित रखरखाव जैसी बुनियादी जरूरतें भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। जिस खेल में बच्चे को प्रतियोगिता के लिए उतारा जाना है, अगर उसके अभ्यास के लिए उपयुक्त मैदान ही नहीं है तो उससे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कितनी व्यावहारिक है? खिलाड़ी को प्रतियोगिता से एक-दो महीने पहले तैयार नहीं किया जा सकता। खेल में निरंतर अभ्यास चाहिए और अभ्यास के लिए मैदान।

शारीरिक शिक्षक सिर्फ पीरियड लेने वाला शिक्षक नहीं

स्कूल में खेल प्रतिभा को पहचानने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शारीरिक शिक्षक है। उसकी भूमिका केवल खेल का पीरियड पूरा कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। कौन बच्चा अच्छा धावक बन सकता है, किसमें कबड्डी की क्षमता है, कौन कुश्ती के लिए उपयुक्त है और किस विद्यार्थी में फुटबॉल, हॉकी या किसी अन्य खेल की प्रतिभा छिपी है—इन क्षमताओं को सबसे पहले पहचानने का काम शारीरिक शिक्षक ही कर सकता है।

इसके बाद खिलाड़ी को नियमित अभ्यास कराना, फिटनेस पर नजर रखना, उसकी कमियों को दूर करना और प्रतियोगिता के लिए तैयार करना भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। जरूरत इस बात की है कि शारीरिक शिक्षकों को सालभर की खेल प्रशिक्षण योजना बनाने और उस पर काम करने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन मिलें। केवल प्रतियोगिता नजदीक आने पर खिलाड़ी तैयार करने की व्यवस्था से प्रतिभाओं को वह धार नहीं मिल सकती, जिसकी उन्हें जरूरत है।

जब खेल का प्रमाणपत्र नौकरी के दरवाजे खोल सकता है तो खेल शिक्षा पीछे क्यों?

खेल अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गया है। उत्कृष्ट खेल उपलब्धियां विद्यार्थियों के भविष्य में रोजगार के अवसर भी पैदा करती हैं। शारीरिक शिक्षक की भर्ती में खेल प्रमाणपत्र के आधार पर अधिकतम 40 अंक तक का प्रावधान प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए बड़ा अवसर बन सकता है। इसके अलावा सरकारी नौकरियों में खिलाड़ियों के लिए 2 प्रतिशत आरक्षण है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक हासिल करने वाले खिलाड़ियों के लिए सरकारी सेवा में विशेष अवसर भी उपलब्ध हैं और विभिन्न विभागों में उन्हें ऊंचे पद दिए जाने का प्रावधान रहा है। ऐसे में खेल को केवल खाली समय की गतिविधि मानना उचित नहीं होगा। स्कूल के मैदान में आज पसीना बहाने वाला बच्चा कल राज्य, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने साथ प्रदेश और देश का नाम भी रोशन कर सकता है।

टीए-डीए और पोषाहार में सिर्फ औपचारिकता नहीं, जरूरत के हिसाब से व्यवस्था चाहिए

विद्यालयी खेल प्रतियोगिताओं में एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती उस समय सामने आती है, जब बच्चे को जिला या राज्य स्तर की प्रतियोगिता में भेजना होता है। यात्रा, टीए-डीए, भोजन और खेल पोषाहार की व्यवस्था पर्याप्त नहीं हुई तो इसका असर सीधे विद्यार्थी, विद्यालय और अभिभावकों पर पड़ता है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो सकती है।

प्रतिभा आर्थिक स्थिति देखकर पैदा नहीं होती। गांव और सामान्य परिवार का बच्चा भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बन सकता है। लेकिन उसके पास प्रतियोगिता तक पहुंचने और वहां टिककर प्रदर्शन करने के संसाधन होने चाहिए। इसलिए टीए-डीए और खेल पोषाहार की राशि का समय-समय पर वास्तविक खर्च के हिसाब से पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए। महंगाई और यात्रा व भोजन की मौजूदा लागत के अनुरूप व्यवस्था होगी, तभी आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का प्रतिभाशाली बच्चा भी बराबरी से मुकाबला कर सकेगा।

स्कूल से अंतरराष्ट्रीय मंच तक खिलाड़ी की पूरी सीढ़ी बनानी होगी

राजस्थान में विद्यालयी खेल प्रतियोगिताओं का बड़ा ढांचा मौजूद है। जिला और राज्य स्तर पर अलग-अलग आयु वर्गों के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। लेकिन इस व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ प्रतियोगिता करवाना नहीं होना चाहिए। स्कूल से ब्लॉक, ब्लॉक से जिला, जिला से राज्य और फिर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक खिलाड़ी के विकास की स्पष्ट व्यवस्था बननी चाहिए।

हर जिले में उभरती खेल प्रतिभाओं का रिकॉर्ड तैयार हो। बेहतर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को विशेषज्ञ प्रशिक्षण मिले। चयन के बाद भी उनकी प्रगति पर नजर रखी जाए। सिर्फ एक प्रतियोगिता में अच्छा प्रदर्शन कर लेने के बाद खिलाड़ी को व्यवस्था के भरोसे छोड़ देना पर्याप्त नहीं है।

इसी तरह अच्छे खिलाड़ियों के साथ अच्छे प्रशिक्षकों को भी सम्मान और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। क्योंकि खिलाड़ी पदक जीतता है, लेकिन उस पदक के पीछे लंबे समय तक काम करने वाला प्रशिक्षक भी होता है।

मोबाइल की स्क्रीन से मैदान तक लाना भी खेल नीति का हिस्सा होना चाहिए

आज बच्चों की दिनचर्या में मोबाइल और इंटरनेट ने बड़ी जगह बना ली है। पहले रस्सी, कबड्डी, पकड़म-पकड़ाई, खो-खो, फुटबॉल जैसे खेल बच्चों के मनोरंजन और शारीरिक गतिविधि का हिस्सा थे। अब स्क्रीन ने उस जगह का बड़ा हिस्सा ले लिया है। इस बदलाव का असर बच्चों की शारीरिक सक्रियता पर भी पड़ रहा है। ऐसे समय में विद्यालयी खेल प्रतियोगिताओं की भूमिका और बढ़ जाती है। बच्चों को मैदान तक लाना सिर्फ पदक की तैयारी नहीं है। यह उन्हें स्वस्थ, अनुशासित, सक्रिय और आत्मविश्वासी बनाने का माध्यम भी है।

पदक की शुरुआत स्कूल के मैदान से होती है

सरकार खेल और खिलाड़ियों के विकास के लिए प्रयास कर रही है। खिलाड़ियों के लिए आरक्षण से लेकर अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों पर विशेष अवसर तक कई व्यवस्थाएं मौजूद हैं। लेकिन इन व्यवस्थाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब प्रतिभा को स्कूल स्तर से ही सही आधार मिले।

इसलिए खेल मैदान को अतिरिक्त सुविधा, शारीरिक शिक्षक को केवल एक विषय शिक्षक और खेल सामग्री को सामान्य खर्च मानने की सोच बदलनी होगी। क्योंकि खिलाड़ी मैदान में पदक जीतता है, लेकिन उस पदक की नींव स्कूल के मैदान में रखी जाती है।

इसलिए खेल मैदान, प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षक, आधुनिक खेल उपकरण, नियमित प्रशिक्षण, पोषाहार और प्रतियोगिताओं के लिए पर्याप्त टीए-डीए को खर्च नहीं, बल्कि भविष्य के खिलाड़ियों और भविष्य के भारत में निवेश मानना होगा।

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