राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गंभीर मामले में दोषी ठहराए जाने पर भी किसी कर्मचारी की पूरी पेंशन बिना सोचे-समझे नहीं रोकी जा सकती। कोर्ट ने रोडवेज अधिकारी की पेंशन रोकने का आदेश रद्द कर दिया।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के व्यापक हितों से जुड़े एक बेहद अहम मामले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को गंभीर मामले में दोषी ठहराए जाने का मतलब यह नहीं है कि उसकी पूरी पेंशन बिना सोचे-समझें और बिना किसी ठोस विचार के रोक दी जाए। अदालत ने यह कड़ा संदेश दिया है कि पेंशन कोई दया या इनाम नहीं, बल्कि कर्मचारी का वैधानिक और कानूनी अधिकार है, जिसे मनमाने तरीके से छीना नहीं जा सकता।
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रोडवेज चेयरमैन का आदेश रद्द, नए सिरे से होगी सुनवाई
मीडिया रिपोर्ट्स के नौसर जस्टिस आनंद शर्मा ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) के एक रिटायर्ड अधिकारी रोहिताश मीणा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने रोडवेज चेयरमैन द्वारा 22 सितंबर 2023 को जारी किए गए उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसके तहत कर्मचारी की पूरी पेंशन रोकने और जब्त करने का फैसला लिया गया था।
अदालत ने मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए सक्षम अधिकारी के पास भेज दिया है। साथ ही यह सख्त निर्देश दिए हैं कि जब तक इस मामले में नया और उचित फैसला नहीं आ जाता, तब तक कर्मचारी को नियमानुसार मिलने वाली नियमित पेंशन का भुगतान लगातार जारी रखा जाए। यदि इस दौरान कोई बकाया पेंशन बनती है, तो उसका भी तुरंत भुगतान किया जाए।
क्या था पूरा मामला?
सेवानिवृत्ति: याचिकाकर्ता रोहिताश मीणा RSRTC में जूनियर अकाउंटेंट के पद पर सेवा में आए थे और असिस्टेंट अकाउंट्स ऑफिसर के पद से 31 मार्च 2023 को रिटायर हुए।
आपराधिक मामला और जांच: उनके खिलाफ 19 अक्टूबर 2011 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एक FIR दर्ज हुई थी, जिसके आधार पर विभागीय जांच भी शुरू की गई। रिटायरमेंट के समय मामला लंबित होने के चलते उन्हें प्रोविजनल पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी दी गई थी।
दोषसिद्धि और सजा: इसके बाद 20 जुलाई 2023 को जयपुर की विशेष अदालत ने उन्हें इस मामले में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई, जिसे हाईकोर्ट ने 2 अगस्त 2023 को निलंबित कर दिया था।
पेंशन रोकने का आदेश: इसके तुरंत बाद, रोडवेज प्रबंधन ने नियमों का हवाला देकर उनकी पूरी पेंशन रोकने और जब्त करने का आदेश जारी कर दिया था, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं: हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान निगम की ओर से दलील दी गई कि इस आदेश के खिलाफ अपील का अन्य विकल्प मौजूद था। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी प्रशासनिक आदेश में ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ (Principles of Natural Justice) का खुला उल्लंघन हुआ हो और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का मौका तक न दिया गया हो, तो अदालत सीधे हस्तक्षेप कर सकती है।
अदालत ने अपने पूर्व के फैसले ‘रामजीलाल जांगिड़ बनाम RSRTC’ का हवाला देते हुए दोहराया कि दोषसिद्धि के बाद भी पूरी पेंशन रोकने का फैसला अपने आप (ऑटोमैटिक) नहीं लिया जा सकता। सक्षम अधिकारी को यह तय करना होगा कि अपराध की गंभीरता और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए इतनी कठोर कार्रवाई यानी पूरी पेंशन रोकना आखिर क्यों जरूरी है।
कर्मचारियों के व्यापक हितों पर दूरगामी असर
यह फैसला केवल एक कर्मचारी की कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश और राज्य के लाखों कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा एक मजबूत मील का पत्थर है। यह निर्णय यह तय करता है कि प्रशासनिक अमला किसी भी कर्मचारी के सालों की मेहनत की कमाई और बुढ़ापे के सहारे को एक झटके में और बिना सुनवाई के ताक पर नहीं रख सकता।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि सक्षम अधिकारी अब कर्मचारी को नया कारण बताओ नोटिस जारी करें, उन्हें राहत देने वाली और अन्य परिस्थितियों पर अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दें। सभी पक्षों को सुनने और तार्किक कारणों के आधार पर ही तीन महीने के भीतर नया आदेश पारित किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामले में दोषसिद्धि अपनी जगह है, लेकिन पेंशन रोकने जैसी प्रशासनिक कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया और न्याय के नियमों का पालन होना अनिवार्य है।
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