किसानों के लिए बड़ा अपडेट: 15 नई कृषि तकनीकें और फसल किस्में अब खेतों तक पहुंचाने की तैयारी

एमपीयूएटी उदयपुर की बैठक में 15 नई कृषि तकनीकों और फसल किस्मों को पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज में शामिल कराने का फैसला हुआ। 10 ATC की तकनीकों की भी समीक्षा होगी।

उदयपुर। किसानों के खेतों तक नई कृषि तकनीक और बेहतर फसल किस्में पहुंचाने की दिशा में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी), उदयपुर में बड़ा फैसला हुआ है। दो दिन चली क्षेत्रीय अनुसंधान एवं विस्तार सलाहकार समिति की बैठक में विश्वविद्यालय द्वारा विकसित 15 नई कृषि तकनीकों और फसल किस्मों को क्षेत्रीय फसलों की पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज पुस्तिका में शामिल कराने के लिए कृषि विभाग को अनुशंसा भेजने पर सहमति बनी है।

इसके अलावा 10 कृषि तकनीकी केन्द्रों (ATCs) से जुड़ी प्रौद्योगिकियों और सिफारिशों को दोबारा समीक्षा के लिए कृषि तकनीकी केन्द्र, चित्तौड़गढ़ भेजने का निर्णय लिया गया। यानी बैठक में केवल शोध और तकनीकों की समीक्षा तक बात सीमित नहीं रही, बल्कि उन्हें किसानों तक पहुंचाने के अगले चरण पर भी फैसला हुआ।

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दो दिन चली बैठक में किसानों की असली समस्याओं पर मंथन

एमपीयूएटी में हुई बैठक में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के साथ कृषि विभाग के अधिकारी और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल हुए। करीब 70 प्रतिभागियों ने किसानों के सामने आ रही समस्याओं, उनके व्यावहारिक समाधान और विश्वविद्यालय में विकसित तकनीकों को खेतों तक पहुंचाने के तरीकों पर चर्चा की। बैठक में अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत पिछले एक साल में किए गए काम, अनुसंधान उपलब्धियों और प्रगति की भी समीक्षा हुई।

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मक्का से सीताफल तक, कमाई बढ़ाने पर फोकस

समापन सत्र में निदेशक अनुसंधान डॉ. मनोज कुमार महला ने मेवाड़ की प्रमुख फसल मक्का को लेकर उत्पादन से आगे की संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने मक्का के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के जरिए किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने सीताफल जैसी स्थानीय उपज को भी केवल कच्चे उत्पाद के तौर पर बेचने के बजाय उसके मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण के जरिए किसानों की आय बढ़ाने के अवसरों पर जानकारी दी।

आधुनिक कृषि यंत्रों की जानकारी किसानों तक पहुंचाने पर जोर

संयुक्त निदेशक, कृषि (विस्तार), उदयपुर डॉ. सुधीर वर्मा ने विश्वविद्यालय की किसान हितैषी तकनीकों को पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज में शामिल कर किसानों तक पहुंचाने की जरूरत बताई। उन्होंने कृषि मशीनरी और आधुनिक कृषि यंत्रों के प्रचार-प्रसार पर जोर देते हुए कहा कि किसानों को सही मशीनरी की जानकारी और उपलब्धता समय पर मिले तो खेती में लगने वाले समय और श्रम दोनों को कम किया जा सकता है। डॉ. वर्मा ने खेती में बायोचार के इस्तेमाल और मृदा स्वास्थ्य सुधार में इसकी भूमिका पर भी चर्चा की।

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अब सिर्फ उत्पादन नहीं, कृषि उत्पाद की गुणवत्ता भी मुद्दा

अतिरिक्त निदेशक कृषि, भीलवाड़ा डॉ. के.सी. मीणा ने विश्वविद्यालय के अनुसंधान और कृषि विकास कार्यों की सराहना की। उन्होंने कृषि विभाग के अधिकारियों से विश्वविद्यालय की नई किस्मों और तकनीकों को ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाने की बात कही। उन्होंने कहा कि खाद्यान्न और सब्जियों का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में हो रहा है, इसलिए अब उत्पादन के साथ-साथ कृषि उत्पादों की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना जरूरी है।

वैज्ञानिकों और कृषि अधिकारियों के बीच समन्वय पर जोर

बैठक में इस बात पर भी जोर रहा कि विश्वविद्यालय में होने वाला अनुसंधान किसानों की वास्तविक जरूरतों से जुड़ा हो। वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल के जरिए किसान समस्याओं के व्यावहारिक समाधान तलाशने पर चर्चा हुई।

समापन पर क्षेत्रीय अनुसंधान अधिकारी डॉ. एस.एस. लखावत ने बताया कि बैठक के दौरान हुए विचार-विमर्श के बाद 15 नई कृषि तकनीकों एवं फसल किस्मों को क्षेत्रीय फसलों की पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज पुस्तिका में शामिल कराने के लिए कृषि विभाग को अनुशंसा भेजने का निर्णय लिया गया है।

साथ ही 10 कृषि तकनीकी केन्द्रों से संबंधित प्रौद्योगिकियों और सिफारिशों को पुनरावलोकन के लिए चित्तौड़गढ़ भेजा जाएगा। इससे विश्वविद्यालय में विकसित तकनीकों की समीक्षा के साथ उन्हें कृषि विभाग के जरिए किसानों तक पहुंचाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

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