भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में भीषण जल संकट। पांचना बांध से पानी न मिलने के कारण कछुए और मछलियां दम तोड़ रही हैं, प्रजनन काल के बीच पक्षियों पर संकट।
विशेष रिपोर्ट | भरतपुर
जहां कभी हजारों मील दूर साइबेरिया और दुनिया के कोने-कोने से आने वाले परिंदों का कलरव गूंजताथा, आज वहां मौत जैसा सन्नाटा पसरा है। भरतपुर का ऐतिहासिक केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान अपनी सांसें गिन रहा है। पानी की बूंद-बूंद को तरसते इस विश्व धरोहर में सूखे पड़े तालाबों का दृश्य ऐसा है, जो किसी भी संवेदनशील इंसान की आँखें नम कर दे।
सूखी और फटी ज़मीन पर बेबस तड़पते कछुए और घटते पानी में ऑक्सीजन की कमी से तड़प-तड़पकर मरती मछलियाँ—यह किसी आपदा का भयानक मंज़र भर नहीं है, बल्कि एक पूरे जीवंत इकोसिस्टम के विनाश की आहट है।
कैमरे में कैद हुई खामोश तबाही
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर दीपक मुदगल ने इस त्रासदी को दुनिया के सामने रखा है। उनकी तस्वीरों में दिख रही तड़प केवल जलीय जीवों की नहीं, बल्कि इस वेटलैंड के वजूद की चीख है।
“रोज़ मछलियाँ मर रही हैं, कछुए सूखी मिट्टी पर दम तोड़ रहे हैं। पानी के बिना पूरा का पूरा पारितंत्र (Ecosystem) उजड़ रहा है। यह सिर्फ वन्यजीवों का नुकसान नहीं, बल्कि इस धरती की धरोहर पर बहुत बड़ा धब्बा है।” — दीपक मुदगल, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर
आखिर क्यों प्यासा रह गया केवलादेव?
केवलादेव को हर साल जीवनदान देने के लिए 550 एमसीएफटी पानी की ज़रूरत होती है। नियम के मुताबिक यह पानी जुलाई के दूसरे-तीसरे हफ्ते तक पांचना बांध से छोड़ दिया जाना चाहिए।
अधूरी रही वैकल्पिक व्यवस्था: इस बार पांचना से समय पर पानी की एक बूंद नहीं पहुंची। चंबल नदी से जो पानी दिया गया, वह इस विशाल वेटलैंड के लिए बेहद नाकाफी साबित हुआ।
घटता ऑक्सीजन स्तर: पानी घटते ही जो थोड़ा-बहुत जल बचा है, उसमें ऑक्सीजन का स्तर गिर गया है।
अस्थायी बचाव: प्रशासन छोटे जीवों को दूसरे ब्लॉक्स में शिफ्ट करने में जुटा है, लेकिन जब पानी ही नहीं है तो यह कोशिशें भी नाकाम साबित हो रही हैं।
375 पक्षी प्रजातियों पर मंडराया बेघर होने का खतरा
सबसे चिंताजनक बात यह है कि फिलहाल पक्षियों का प्रजनन काल (Breeding Season) चल रहा है।
पानी न होने से जलीय वनस्पतियाँ खत्म हो रही हैं, जो पक्षियों का मुख्य आहार हैं।
यदि स्थिति तुरंत नहीं सुधरी तो यहाँ आने वाले हज़ारों पक्षियों का प्रजनन चक्र पूरी तरह ठप हो जाएगा।
उद्यान की 375 से अधिक पक्षी प्रजातियों का अस्तित्व अब सीधे-सीधे दांव पर लगा है।
क्या हैं तात्कालिक मांगें?
पांचना से तुरंत पानी: बांध के फाटक खोलकर उद्यान में तुरंत जल सप्लाई शुरू की जाए।
स्वतंत्र जल अधिकार: केवलादेव को सिंचाई या पेयजल की सामान्य सूची से हटाकर ‘स्वतंत्र जल अधिकार’ (Independent Water Rights) दिए जाएं।
कैपेसिटी गांरटी: हर साल जून-जुलाई में 550 MCFT पानी तय समय पर देना अनिवार्य किया जाए।
हाई-लेवल मॉनिटरिंग कमेटी: जल स्तर और उसकी क्वालिटी पर नज़र रखने के लिए एक विशेष निगरानी समिति का गठन हो।
अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर भी पड़ेगी मार
अगर यह पक्षी स्वर्ग उजड़ता है, तो इसका खामियाजा सिर्फ प्रकृति को ही नहीं भुगतना पड़ेगा। इससे जुड़े नेचर गाइड, रिक्शा चालक, होटल इंडस्ट्री और भरतपुर के पूरे पर्यटन व्यवसाय पर गहरा आर्थिक संकट मंडराने लगेगा।
राज्य व केंद्र सरकार को इस ‘यूनेस्को विश्व धरोहर’ को बचाने के लिए बिना एक पल गंवाए ठोस कदम उठाने होंगे।
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