खोलो द्वार…

सोच संकुचित इस जगत की, कैसे करें उम्मीद समता की

चलो, आज कुछ अच्छा करते हैं…

चलो,आज कुछ अच्छा करते हैं। कष्टों से रोती दुनिया में…

ब्रज साहित्यकारों ने उठाई उत्तर प्रदेश में ब्रजभाषा अकादमी की मांग

ब्रज साहित्य परिषद न्यास, परासौली, गोवर्धन द्वारा आनंदवन कॉलोनी मथुरा में ब्रजभाषा के वरिष्ठ साहित्यकारों की एक बैठक में ब्रज भाषा एवं ब्रज साहित्य के उन्नयन एवं परिवर्धन पर

त्रय शतक…

तुमको खोला
श्रृंगार शतक सा

सपने अलबेले होते हैं…

आता यथार्थ फन फैलाए ,जीवन का भार न सह पाए

हो पुरुषार्थ प्रखर…

है दंभ बहुत मुझको – तुझको, दिखती खामी सब औरों की

आखिर कैसे गाते…

सम्बन्धों के मधुर गीत, आखिर कैसे गाते

थे धर्मराज…

थे धर्मराज, खेला करते जुआ

सीख…

ज़िन्दगी, तू मुझे हँसना सिखा, मुश्किलों से बचना नहीं

अनमोल बेटियां…

कैसे कोई कर सकता है बेटियों का दान?