अब छुट्टी ‘मांगनी’ नहीं, हक बन गई | 6 महीने में पेड लीव, हर साल कैश और ‘रिजेक्टेड’ छुट्टियां भी नहीं होंगी बेकार

नए लेबर कोड (new labour code) में कर्मचारियों को बड़ी राहत—अब 6 महीने में पेड लीव, हर साल लीव एनकैशमेंट और रिजेक्टेड छुट्टियां भी नहीं होंगी लैप्स। जानें पूरी डिटेल।

नई हवा डैस्क 

केंद्र सरकार के नए लेबर कोड (OSH कोड) ने कर्मचारियों की छुट्टियों के खेल का पूरा नियम ही बदल दिया है। अब तक जहां पेड लीव पाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था, वहीं अब सिस्टम इतना लचीला हो गया है कि नौकरी जॉइन करने के कुछ ही महीनों में कर्मचारी छुट्टियों के असली हकदार बन जाएंगे—और वो भी कई नए फायदे के साथ।

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सबसे बड़ा बदलाव पात्रता (Eligibility) में हुआ है। पुराने फैक्ट्री एक्ट 1948 के तहत किसी भी कर्मचारी को ‘कमाई हुई छुट्टी’ (Earned Leave) का हकदार बनने के लिए साल में कम से कम 240 दिन (करीब 8 महीने) काम करना जरूरी था। लेकिन नए नियम में इस सीमा को घटाकर 180 दिन (सिर्फ 6 महीने) कर दिया गया है। यानी अब नई नौकरी जॉइन करने के महज 6 महीने बाद ही आप पेड लीव लेने के अधिकारी बन जाएंगे।

अब बात उस सुविधा की, जिसका कर्मचारी सालों से इंतजार कर रहे थे—लीव एनकैशमेंट। पहले ज्यादातर राज्यों में नियम था कि छुट्टियों का पैसा सिर्फ नौकरी छोड़ने, रिटायरमेंट या सेवा समाप्ति के समय ही मिलता था। लेकिन नए लेबर कोड ने इसमें बड़ा बदलाव करते हुए एनुअल एनकैशमेंट का विकल्प दे दिया है। यानी अब आप हर साल के अंत में अपनी बची हुई छुट्टियों को कैश में बदल सकते हैं।

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नियम यह कहता है कि अगर आपकी छुट्टियां 30 दिन की तय सीमा से ज्यादा हो जाती हैं, तो अतिरिक्त छुट्टियों का पैसा कंपनी को आपको देना होगा—वह भी आपकी बेसिक सैलरी के आधार पर

वर्कलोड के नाम पर छुट्टी रोकने वाले सिस्टम पर भी अब ब्रेक लग गया है। अक्सर कंपनियां छुट्टी मंजूर नहीं करती थीं और साल के आखिर में वे छुट्टियां ‘लैप्स’ हो जाती थीं। लेकिन अब नया नियम साफ कहता है—
अगर आपने नियम के तहत छुट्टी मांगी और कंपनी ने उसे ठुकरा दिया, तो वह छुट्टी खत्म नहीं होगी, बल्कि अगले साल के लिए बिना किसी लिमिट के जुड़ जाएगी

इसे ऐसे समझिए—
अगर आपके पास 45 छुट्टियां बची हैं, तो 30 छुट्टियां अगले साल ट्रांसफर हो जाएंगी और बाकी 15 दिनों का पैसा आपको मिल सकता है।
सबसे खास बात—जो छुट्टियां बॉस ने रिजेक्ट की हैं, वे 30 दिन की सीमा में भी नहीं गिनी जाएंगी। यानी ये छुट्टियां अलग से जुड़ती रहेंगी और भविष्य में कभी भी कैश कराई जा सकती हैं।

नए लेबर कोड ने एक तरह से ‘लीव लैप्स’ सिस्टम को खत्म कर दिया है। अब कर्मचारी अपनी 30 दिन तक की छुट्टियां अगले साल के लिए बचा सकता है और उससे ज्यादा छुट्टियों का कैश ले सकता है।

इसके साथ ही एक और अहम प्रावधान जोड़ा गया है—
किसी भी प्रकार का सेटलमेंट (जैसे नौकरी छोड़ना आदि) होने पर भुगतान 48 घंटे के भीतर करना होगा।

हालांकि, ये नियम अभी पूरी तरह जमीन पर लागू नहीं हुए हैं। केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 को इसकी रूपरेखा जारी कर दी थी, लेकिन चूंकि लेबर लॉ केंद्र और राज्य दोनों का विषय है, इसलिए जब तक राज्य सरकारें इसे अधिसूचित (Notify) नहीं करेंगी, तब तक कंपनियों के लिए इसे लागू करना अनिवार्य नहीं होगा।

जैसे ही राज्यों से हरी झंडी मिलेगी, देश के करोड़ों कर्मचारियों के लिए छुट्टियों का यह नया, लचीला और फायदे वाला सिस्टम लागू हो जाएगा—जहां छुट्टी अब ‘मेहरबानी’ नहीं, बल्कि पक्का अधिकार होगी।

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