डॉ. शिखा अग्रवाल, सेवानिवृत्त सहआचार्य (कॉलेज शिक्षा), सीकर
बचपन में कंधों पर घुमाते, हर छोटी बड़ी फरमाइश को पूरा करते पिता, बेटे के बहकते कदमों और बेटी की नादानियों पर उदास हो शून्य में खो जाते हैं।
बाहर से कठोर बने मोम सा दिल लिए, बेटी की शादी में जी जान से लगे पिता विदाई पर लाडली की नहीं रोक पाते रुलाई क्योंकि बेटी हो गई पराई।
कद में बराबर हो गए बेटे की नौकरी पर गर्व करते, आगे बढ़ने की प्रेरणा देते, अनुभव की पोटली से अनमोल सलाह देते पिता बन जाते हैं बेटे के मित्र।
वो पिता ही हैं जो चाहते हैं कि बच्चे उनसे आगे बढ़े पद- प्रतिष्ठा, समाज में; जीवन के हर झंझावात में संभालने के लिए खड़े हैं वो एक वट वृक्ष की तरह।
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