उदयपुर के राजस्थान कृषि महाविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता बचाने का संदेश दिया गया।
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उदयपुर
अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के अवसर पर राजस्थान कृषि महाविद्यालय में जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जहां पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और सतत विकास को लेकर गंभीर चिंतन सामने आया।
कार्यक्रम में पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. एन. सी. जैन ने स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि पारंपरिक जल स्रोतों, स्थानीय बीजों, औषधीय पौधों और वन्यजीवों की रक्षा करना केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी के जरिए जल संरक्षण, जैविक खेती और पौधरोपण को बढ़ावा देने की बात कही।
मुख्य अतिथि डॉ. आर. एल. सोनी ने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगिक प्रदूषण और प्लास्टिक कचरे के कारण कई जीव-जंतु और वनस्पति प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो पारिस्थितिक असंतुलन मानव जीवन के लिए बड़ा संकट बन सकता है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. मनोज महला ने कहा कि जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन की मूल आधारशिला है। वनस्पतियां, जीव-जंतु, पक्षी, सूक्ष्मजीव और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि जैव विविधता का संबंध केवल प्रकृति की सुंदरता से नहीं बल्कि कृषि, औषधि, जल संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास से भी सीधा जुड़ा हुआ है।
कार्यक्रम के आयोजक डॉ. कपिल देव आमेटा ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम “स्थानीय प्रयासों से वैश्विक प्रभाव” रखी गई है, जिसका उद्देश्य प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और सतत विकास में जैव विविधता की भूमिका को रेखांकित करना है।
इस अवसर पर डॉ. एस. एस. लखावत, डॉ. एल. एन. महावर, डॉ. बी. जी. छीपा, डॉ. रविकांत शर्मा, डॉ. शालिनी पिलानिया, डॉ. एच. एल. बैरवा और डॉ. अमित दाधीच सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान सभी को जैव विविधता संरक्षण की शपथ भी दिलाई गई।
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