पति-पत्नी की एक जगह पोस्टिंग पर राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला, फिर भी कर्मचारियों के लिए खुला ये रास्ता

राजस्थान हाईकोर्ट ने पति-पत्नी की एक जगह पोस्टिंग से जुड़ी सात याचिकाएं खारिज कीं। जानिए तबादला नीति, प्रशासनिक जरूरतों और अभ्यावेदन पर अदालत का रुख।

जोधपुर। पति-पत्नी दोनों सरकारी नौकरी में हों और अलग-अलग जगह तैनात हों, तो क्या जीवनसाथी के कार्यस्थल पर तबादले की मांग को अधिकार मानकर स्वीकार करना जरूरी है? राजस्थान हाईकोर्ट ने जेल विभाग के कार्मिकों से जुड़े सात मामलों में इस सवाल पर अपना रुख स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि पति-पत्नी को एक जगह पदस्थापित करने की सरकारी नीति का महत्व है, लेकिन इसके आधार पर मनचाही पोस्टिंग का दावा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस कुलदीप माथुर की एकलपीठ ने सुनील कुमार सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाएं खारिज कर दीं। हालांकि, कर्मचारियों के लिए संबंधित विभाग के सामने दो सप्ताह के भीतर नया अभ्यावेदन देने का रास्ता खुला रखा गया है। विभाग को ऐसे अभ्यावेदनों पर निष्पक्षता से विचार कर कानून के अनुसार निर्णय लेना होगा।

जीवनसाथी के कार्यस्थल पर पोस्टिंग की थी मांग

मामले में विभिन्न जेलों में तैनात कार्मिकों ने अदालत से राहत मांगी थी। उनकी मांग थी कि उन्हें उस स्थान या उसके नजदीक पदस्थापित किया जाए, जहां उनके पति या पत्नी सरकारी सेवा में काम कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने अलग-अलग स्थानों पर नौकरी करने से जुड़ी पारिवारिक और व्यावहारिक परेशानियों का हवाला देते हुए राज्य सरकार की पति-पत्नी को एक स्थान पर पोस्टिंग देने की नीति का सहारा लिया था। मामले में गृह विभाग, कारागार महानिदेशक, संबंधित उप महानिरीक्षक और जेल अधीक्षकों सहित सरकारी अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया था।

नीति है, लेकिन तबादले की गारंटी नहीं

हाईकोर्ट ने माना कि पति-पत्नी को यथासंभव एक स्थान, जिले या मुख्यालय पर पदस्थापित करने की नीति परिवार और बच्चों के हित में महत्वपूर्ण है। इससे पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने में मदद मिल सकती है।

लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी नीति का मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी जहां चाहे, वहां तबादला पाने का कानूनी अधिकार हासिल कर ले। पोस्टिंग पर फैसला करते समय प्रशासनिक जरूरतों, रिक्त पदों, संबंधित संवर्ग और सेवा नियमों को भी देखना होगा।

अदालत ने यह अंतर भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के प्रशासनिक सुधार विभाग का 18 मई 2020 का परिपत्र निर्धारित शर्तों के अधीन प्रथम नियुक्ति के समय पदस्थापन स्थल आवंटित करने से संबंधित है। इसे पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी के लिए मनचाही जगह तबादले की गारंटी नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया सहारा

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के Bank of India v. Jagjit Singh Mehta और S.K. Nausad Rahaman v. Union of India मामलों का उल्लेख किया। इन फैसलों के संदर्भ में अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों की पारिवारिक परिस्थितियों पर विचार करना महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रशासनिक आवश्यकताओं की अनदेखी करके पोस्टिंग का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने पारिवारिक जीवन के संरक्षण से जुड़े संवैधानिक मूल्यों को भी महत्वपूर्ण माना। साथ ही कहा कि पति-पत्नी की एक जगह तैनाती पर विचार करते समय दोनों की सेवा संबंधी जिम्मेदारियों और पेशेवर हितों को निष्पक्षता से देखना चाहिए। यह मानकर नहीं चला जा सकता कि किसी एक कर्मचारी का करियर हमेशा दूसरे की पोस्टिंग के अनुरूप बदला जाए।

रिक्त पद होने पर भी फैसला प्रशासन का

अदालत के अनुसार, कर्मचारी की पसंद के स्थान पर पद खाली होना महत्वपूर्ण है, लेकिन सिर्फ रिक्त पद होने से तबादले का दावा अपने आप स्वीकार नहीं हो जाता। संबंधित पद की प्रकृति, संवर्ग, विभागीय जरूरतों, कर्मचारियों की उपलब्धता और अन्य प्रशासनिक परिस्थितियों पर भी विचार करना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तबादले के फैसले में मनमानी, भेदभाव या दुर्भावना नहीं होनी चाहिए। यदि कोई प्रशासनिक आदेश कानूनी प्रावधानों के विपरीत या अन्य वैधानिक आधारों पर गलत पाया जाता है, तो न्यायिक हस्तक्षेप संभव है। हालांकि, सामान्य परिस्थितियों में अदालत प्रशासन की जगह खुद यह तय नहीं करेगी कि कर्मचारी की पोस्टिंग कहां होनी चाहिए।

सातों याचिकाएं खारिज, अब अभ्यावेदन का विकल्प

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पति-पत्नी को एक जगह पोस्टिंग देने की नीति के आधार पर मांगी गई राहत देने से इनकार कर दिया और सातों याचिकाएं खारिज कर दीं। हालांकि, याचिकाकर्ताओं को संबंधित विभाग के सामने दो सप्ताह के भीतर नया अभ्यावेदन पेश करने की छूट दी गई है। विभाग को इन पर निष्पक्षता से विचार कर कानून के मुताबिक निर्णय लेना होगा।

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