डॉ. विनीता राठौड़ की आध्यात्मिक कविता ‘व्यथा अंतस में रहने दो’ पीड़ा, कठिनाइयों और प्रभु की शरण के माध्यम से जीवन को स्वीकार करने का संदेश देती है।
व्यथा अंतस की अंतस में रहने दो
शब्दों द्वारा व्यर्थ वजन नहीं दो
अंतर के उद्गार सहन न हो तो
प्रभु की शरण वहन तुम कर लो
जो पीड़ा देते हैं अपार
करो उनका सदैव आभार
कर्मदण्ड शीघ्र वे पूर्ण कराते
ईश्वर का सानिध्य तुम पा जाते
मुश्किलें प्रिय भक्त के हिस्से में ही आती
दुख में प्रभु का स्मरण सतत करवाती
प्रभु प्रीत के गीत गुनगुनाती
भव सागर को पार कराती।
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