कुरुक्षेत्र अस्पताल विवाद में नया मोड़ | नर्सों को बलि का बकरा बनाने का आरोप, डीएमए ने उठाए सवाल

कुरुक्षेत्र अस्पताल प्रकरण पर डीएमए इंडिया ने नर्सिंग स्टाफ को अकेले जिम्मेदार ठहराने पर सवाल उठाए हैं। संगठन ने प्रशासनिक जवाबदेही, स्टाफ की कमी और भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र अस्पताल प्रकरण में लगातार उठ रहे सवालों के बीच अब डॉक्टरों के राष्ट्रीय संगठन डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए इंडिया) ने भी खुलकर अपनी बात रखी है। संगठन ने हरियाणा राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्षा रेणु भाटिया के बयानों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा है कि पूरे मामले का ठीकरा केवल नर्सिंग स्टाफ पर फोड़ना न तो न्यायसंगत है और न ही तथ्यों के अनुरूप।

डीएमए इंडिया की ओर से राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. भानु कुमार, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. शुभ प्रताप सोलंकी तथा कोर सदस्य डॉ. प्रांजल निबुदे ने संयुक्त रूप से एक आधिकारिक पत्र जारी कर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।

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संगठन का कहना है कि किसी भी गंभीर अस्पतालीय घटना की जांच तभी निष्पक्ष मानी जा सकती है जब उसमें केवल कर्मचारियों की भूमिका ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे, निगरानी व्यवस्था और संस्थागत जवाबदेही की भी पड़ताल की जाए।

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‘सिर्फ नर्सों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं’

डीएमए ने कहा कि चिकित्सा नैतिकता और अस्पतालों की मानक कार्यप्रणाली के अनुसार किसी महिला मरीज की जांच या उपचार के दौरान महिला स्टाफ की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था होती है। लेकिन इस व्यवस्था को लागू करना और उसकी निगरानी करना केवल नर्सिंग स्टाफ का काम नहीं है।

संगठन के अनुसार अस्पताल प्रशासन, विभागीय अधिकारी, प्रबंधन और उपचार से जुड़े सभी स्तरों की इसमें समान जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यदि किसी घटना में केवल नर्सिंग समुदाय को कठघरे में खड़ा किया जाता है, तो यह जांच के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है।

स्टाफ की कमी पर भी उठे सवाल

डीएमए ने देशभर के अस्पतालों में वर्षों से चली आ रही स्टाफ की कमी और बढ़ते कार्यभार का मुद्दा भी उठाया। संगठन का कहना है कि सरकारी और निजी दोनों स्वास्थ्य संस्थानों में सीमित संसाधनों के बीच नर्सिंग कर्मचारी लगातार दबाव में काम कर रहे हैं।

ऐसे हालात में किसी घटना का मूल्यांकन करते समय यह देखना भी जरूरी है कि उस समय पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध था या नहीं, कार्य का दबाव कितना था और प्रशासन ने संसाधनों की व्यवस्था किस स्तर तक की थी।

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डा .अमित व्यास

भर्ती प्रक्रिया पर भी मांगे जवाब

संगठन ने कुछ ऐसे सवाल भी उठाए हैं जिन पर अब तक सार्वजनिक रूप से चर्चा कम हुई है।

डीएमए ने पूछा है कि क्या संबंधित व्यक्ति का नियुक्ति से पहले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पृष्ठभूमि सत्यापन किया गया था? यदि पहले से किसी प्रकार की शिकायत या आशंका मौजूद थी तो उसे नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति कैसे मिली? और यदि कहीं चूक हुई तो उसकी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जा रही?

संगठन का कहना है कि इन सवालों के जवाब तलाशे बिना केवल एक वर्ग को दोषी ठहरा देना निष्पक्ष जांच की भावना के खिलाफ होगा।

‘नर्सिंग समुदाय स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़’

राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास ने कहा कि नर्सिंग समुदाय स्वास्थ्य सेवाओं की आधारशिला है। देशभर में लाखों नर्सिंग कर्मी कठिन परिस्थितियों में मरीजों की सेवा कर रहे हैं। किसी एक घटना के आधार पर पूरे समुदाय की छवि पर सवाल उठाना उनके मनोबल को प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने कहा कि न्याय तभी संभव है जब जांच व्यापक, निष्पक्ष और संस्थागत जवाबदेही के सिद्धांतों पर आधारित हो। इससे न केवल सच्चाई सामने आएगी बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।

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कुरुक्षेत्र अस्पताल प्रकरण में अब बहस केवल एक घटना तक सीमित नहीं रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या स्वास्थ्य संस्थानों में जवाबदेही का दायरा सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित रहेगा या फिर प्रशासनिक और व्यवस्थागत कमियों की भी उतनी ही गंभीर जांच होगी।

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