ममता के किले में सबसे बड़ी सेंध | भूपेंद्र यादव के घर जुटे 20 सांसद, NDA को समर्थन का ऐलान; बंगाल में 58 विधायक पहले ही चुन चुके नया नेता

तृणमूल कांग्रेस में बड़ा राजनीतिक संकट गहराता दिख रहा है। भूपेंद्र यादव के घर 20 सांसदों की बैठक, NDA को समर्थन का दावा और 58 बागी विधायकों द्वारा नया नेता चुनने से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

नई दिल्ली/कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस में बगावत अब फुसफुसाहट नहीं, खुली चुनौती बन चुकी है। बंगाल में 58 विधायक अलग रास्ता पकड़ चुके हैं और अब पार्टी के 20 सांसदों ने भी ममता बनर्जी के नेतृत्व से दूरी बनाने का फैसला कर लिया है। सोमवार को केंद्रीय मंत्री और भाजपा के बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के दिल्ली स्थित आवास पर हुई बैठक ने साफ संकेत दे दिया कि टीएमसी के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। लोकसभा के 28 सांसदों में से 20 ने एनडीए सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है। सांसद और TMC की पूर्व नेता काकोली घोष दस्तीदार ने भी सोमवार को यही दावा किया। उन्होंने बताया कि 20 सांसदों ने NDA को समर्थन देने की जानकारी लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को दे दी है। जल्द ही स्पीकर को पत्र भी भेज दिया जाएगा।

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बंगाल में 58 विधायक अलग राजनीतिक लाइन खींच चुके हैं और अब पार्टी के संसदीय खेमे में भी बड़ी टूट सामने आ गई है। सोमवार को केंद्रीय मंत्री और भाजपा के बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के दिल्ली स्थित आवास पर हुई बैठक ने साफ संकेत दे दिया कि ममता बनर्जी के सामने पार्टी के भीतर सबसे बड़ा संकट खड़ा हो चुका है।

दिल्ली में हुई इस अहम बैठक में तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद शामिल हुए। बैठक की सबसे बड़ी राजनीतिक अहमियत यह रही कि यह किसी तटस्थ स्थान पर नहीं, बल्कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के घर पर हुई। यही वजह है कि इस घटनाक्रम को बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

बैठक के दौरान राज्यसभा सांसद पद और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे चुके वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रे भी मौजूद रहे। वहीं पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी और बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी इन सांसदों से मिलने पहुंचे। दिल्ली में एक ही छत के नीचे हुई इन मुलाकातों ने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी।

बैठक में काकोली घोष, शताब्दी रॉय, अबू ताहिर, अरूप चक्रवर्ती, खलीलुर रहमान, शर्मिला सरकार, असित मल, कालीपद सोरेन, जगदीश बसुनिया और प्रसून बनर्जी समेत कई सांसद मौजूद रहे। बाकी सांसदों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा बयान पूर्व टीएमसी नेता काकोली घोष की ओर से आया। उन्होंने कहा कि पार्टी के 20 सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने का फैसला किया है और इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भी भेज दिया गया है। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो संसद में टीएमसी की ताकत पर सीधा असर पड़ सकता है।

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 सांसद हैं। संसदीय गणित के हिसाब से 20 सांसदों का एक साथ खड़ा होना किसी साधारण नाराजगी का संकेत नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर गहरे राजनीतिक विभाजन की तस्वीर पेश करता है। बागी सांसदों का एक वर्ग पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह लोकसभा में अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व से सहमत नहीं है और काकोली घोष को आगे देखना चाहता है।

दिल्ली में यह राजनीतिक हलचल उस समय तेज हुई जब सुबह-सुबह सुखेंदु शेखर रे ने राज्यसभा सदस्यता और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद टीएमसी के कई सांसद उनसे मिलने पहुंचे। इस मुलाकात ने भी यह संकेत दिया कि पार्टी के भीतर असंतोष केवल विधायकों तक सीमित नहीं रह गया है।

उधर बंगाल में भी हालात कम विस्फोटक नहीं हैं। तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में पहली बार औपचारिक टूट दर्ज हुई है। बुधवार को 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को समर्थन पत्र सौंप दिया। पत्र में ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष घोषित करने की मांग की गई, जिसे स्पीकर ने मंजूरी दे दी।

ऋतब्रत बनर्जी पहले ही संकेत दे चुके हैं कि पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा है। वहीं सुखेंदु शेखर रे के इस्तीफे ने यह संदेश दिया है कि नाराजगी अब संगठन के सबसे वरिष्ठ नेताओं तक पहुंच चुकी है।

एक समय जिस तृणमूल कांग्रेस को ममता बनर्जी की सबसे मजबूत राजनीतिक मशीन माना जाता था, आज उसी पार्टी के भीतर विधायक और सांसद दोनों मोर्चों पर बगावत की तस्वीर दिखाई दे रही है। बंगाल विधानसभा से लेकर संसद तक फैल चुका यह संकट आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा घटनाक्रम बन सकता है।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि ममता बनर्जी इस चुनौती का जवाब कैसे देती हैं और क्या पार्टी नेतृत्व इस टूट को रोक पाएगा या फिर टीएमसी का सियासी संकट और गहरा होगा।

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