चांद गवाह

कार्तिक मास की चतुर्थी पर
करवा चौथ मनाती सुहागन हर

वो पिता ही है जो…

वो पिता ही है
जो सब कुछ सह जाता है।
तपती धूप में

 कब तक सिसकेगी मानवता…

मेहनतकश को है सज़ा यहां,
नाकारा इज्जत पाते हैं,
खुद का हक है सबको प्यारा

 कब तक सिसकेगी मानवता…

मेहनतकश को है सज़ा यहां,
नाकारा इज्जत पाते हैं,
खुद का हक है सबको प्यारा

पुकार…

हे आशुतोष मुझे अपना लो
अपने जैसा मुझे बना लो

आज की लक्ष्मीबाई…

प्रातः काल जो धधक उठी थी,
क्रोध भरी चिंगारी थी।
मत पूछो वो कौन थी यारो

पी चुके हैं हम विष का प्याला

बस बहुत हुआ अब और नहीं,
तुझमें मेरा अब ठौर नहीं,
बहुत अलग है दुनिया मेरी,
इस दुनिया में तेरा गौर नहीं।

आओ भारत नया बनाएं

नई लीक पर
नई सीख पर
नए सृजन की
राह सजाएं।

सीख…

ज़िन्दगी, तू मुझे हँसना सिखा, मुश्किलों से बचना नहीं

तबाही का मंजर…

हर जगह चीखे हैं…