सरकारी सेवा से होकर निवृत्त
प्रभु भजन में अब होना है रत
Tag: poem
नाहक डर – डर कर यूं क्यूं जीना…
जाने भी दो यारो
नाहक डर -डर कर यूं क्यूं जीना
हरि इच्छा के बिना है असंभव
पी चुके हैं हम विष का प्याला
बस बहुत हुआ अब और नहीं,
तुझमें मेरा अब ठौर नहीं,
बहुत अलग है दुनिया मेरी,
इस दुनिया में तेरा गौर नहीं।
