दूदू में रोडवेज बस में टिकट को लेकर ट्रांसजेंडर वकील और परिचालक के बीच तीखी बहस का मामला थाने तक पहुँचा। आधे घंटे की समझाइश के बाद मामला शांत, वकील बोली—ट्रांसजेंडर टिकट व्यवस्था पर हाईकोर्ट में रिट दाखिल करूंगी।
दूदू
राजस्थान रोडवेज की एक साधारण-सी बस अचानक मोबाइल कोर्ट में बदल गई—वही बस, वही सीटें, लेकिन बहस सुप्रीम कोर्ट वाली गर्माहट लेकर पहुंची। ब्यावर डिपो की जयपुर–जोधपुर रूट पर चल रही बस में जयपुर से सवार एक ट्रांसजेंडर वकील और परिचालक के बीच टिकट को लेकर ऐसा तकरार छिड़ी कि ड्राइवर ने भी सोचा—“चलो भाई, सीधे थाने चलते हैं, वहीं निपटारा होगा।”
मामला शुरू हुआ टिकट से। परिचालक ने वकील को महिला श्रेणी का टिकट थमा दिया। वकील ने टिकट देखते ही आपत्ति—
“मैं ट्रांसजेंडर कैटेगरी में आती हूँ। मुझे उसी कैटेगरी का टिकट चाहिए।”
परिचालक की मजबूरी—“मैडम, मशीन में सिर्फ दो ही बटन—पुरुष और महिला। तीसरा बटन होता तो मैं भी दे देता!”
यही से बहस का पहिया चल पड़ा। बहस बढ़ती गई, गर्मी चढ़ती गई, सवारियों की साँसें अटकती गईं… और आखिर बस थाने पहुँच गई। दूदू थानाधिकारी मुकेश कुमार ने बस में चढ़कर दोनों पक्षों को करीब आधे घंटे समझाया। माहौल ठंडा हुआ, बहस का पारा नीचे उतर आया।
वकील का तर्क साफ—
“सरकार हमें थर्ड जेंडर मान्यता दे चुकी है। आधार में तीसरा विकल्प मौजूद है। टिकट मशीन में विकल्प नहीं है तो शून्य टिकट दें, नियम वही कहता है। यह लगातार अधिकारों का हनन है, अब हाईकोर्ट में रिट दायर करूंगी।”
उधर रोडवेज का पक्ष—
“ट्रांसजेंडर के टिकट का कोई अलग नियम अभी निकला ही नहीं। आदेश आएंगे, तब नया टिकट बनेगा।” — प्रमोद जैन, सहायक अधिकारी, रोडवेज कंट्रोल रूम
अंत में सब शांत, बस फिर रवाना… लेकिन सवाल अपनी जगह खड़ा है—
टिकट तो छोटा था, पर मुद्दा बड़ा निकला।
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