PNB में ‘लोन का खेल’| फर्जी कागज़ों पर करोड़ों की मंजूरी | AJM, चीफ मैनेजर और सीनियर मैनेजर सहित 8 को कारावास

अहमदाबाद (Ahmedabad) सीबीआई अदालत (CBI court) ने पीएनबी (PNB) के 2016 लोन घोटाले में तीन सेवानिवृत्त बैंक अधिकारियों समेत आठ लोगों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। गुरिंदर सिंह, अय्यर और सुरेंद्रनाथ को 2-2 साल की जेल और जुर्माना लगाया गया।

अहमदाबाद 

अहमदाबाद की सीबीआई अदालत में शुक्रवार का दिन पंजाब नेशनल बैंक (PNB) से जुड़े एक पुराने घोटाले पर अंतिम मुहर लगाने वाला साबित हुआ। करीब एक दशक पहले शुरू हुए इस लोन फर्जीवाड़े ने आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंचते हुए बैंकिंग सिस्टम की कमजोर कड़ियों को बेनकाब कर दिया।

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अदालत ने 2016 के इस लोन धोखाधड़ी मामले में तीन रिटायर्ड बैंक अधिकारियों समेत कुल 8 लोगों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। इस पूरे खेल में बैंक को 1.57 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हुआ था — और यह नुकसान किसी बाहरी हैकर ने नहीं, बल्कि अंदर और बाहर की मिलीभगत ने किया।

कैसे हुआ ‘कागज़ों का खेल’?

कहानी शुरू होती है जुलाई 2011 से, जब सूरत स्थित पीएनबी शाखा में 3.70 करोड़ रुपये के टर्म लोन और 40 लाख की कैश क्रेडिट लिमिट के लिए आवेदन किया गया। कागज़ों में सब कुछ परफेक्ट दिखा — मशीनें, बिज़नेस प्लान, गारंटी… लेकिन असल में यह पूरा सेटअप फर्जी दस्तावेजों पर खड़ा था।

जांच में सामने आया कि बैंक के जिम्मेदार अधिकारियों ने बिना उचित जांच-पड़ताल के इन कागज़ों को हरी झंडी दे दी। सिफारिश से लेकर मंजूरी तक की प्रक्रिया में नियमों को दरकिनार किया गया — और यहीं से घोटाले की नींव पड़ गई।

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किसे कितनी सजा?

सीबीआई अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए:

  • रिटायर्ड असिस्टेंट जनरल मैनेजर गुरिंदर सिंह, रिटायर्ड चीफ मैनेजर केजीसीएस अय्यर और रिटायर्ड सीनियर मैनेजर के ई सुरेंद्रनाथ को 2-2 साल की सख्त कैद और 1-1 लाख रुपये जुर्माना
  • कंपनी डायरेक्टर को 3 साल की सजा और जुर्माना
  • अन्य आरोपियों को 2 से 3 साल तक की जेल और आर्थिक दंड
  • संजय पटेल (जलपा एंटरप्राइज प्रा. लि. के निदेशक) को 3 साल जेल + 50 हजार जुर्माना
  • हितेश डोमाडिया को 3 साल जेल + 1 लाख जुर्माना
  • सतीश दावरा, वैशाली दावरा और रमीलाबेन भिकाड़िया को 2-2 साल जेल + 50-50 हजार जुर्माना

साथ ही संबंधित कंपनी पर भी अलग से जुर्माना लगाया गया है।

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सिस्टम पर सवाल, जवाबदेही की घंटी

यह फैसला सिर्फ सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बैंकिंग सिस्टम के लिए एक चेतावनी है। सवाल यह है कि जब कागज़ ही फर्जी थे, तो जांच की परतें इतनी आसानी से कैसे टूट गईं?

सीबीआई की जांच ने साफ किया कि अगर शुरुआती स्तर पर ही नियमों का पालन होता, तो करोड़ों का नुकसान रोका जा सकता था।

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