एमपीयूएटी उदयपुर ने चौथपुरा गांव में मक्का की उन्नत खेती पर कृषक प्रशिक्षण आयोजित किया। वैज्ञानिकों ने PHM-6 किस्म, वैज्ञानिक बुवाई, रोग नियंत्रण और अधिक उत्पादन के उपाय बताए।
उदयपुर। राजस्थान में मक्के की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है। अब पारंपरिक तरीकों के बजाय वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर कम लागत में अधिक और बेहतर गुणवत्ता वाली फसल हासिल की जा सकती है। इसी उद्देश्य से महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी), उदयपुर ने किसानों के बीच पहुंचकर उन्हें आधुनिक खेती के गुर सिखाए।
विश्वविद्यालय के अखिल भारतीय समन्वित मक्का अनुसंधान परियोजना (AICRP on Maize) के तहत ग्राम चौथपुरा में एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें किसानों को मक्के की उन्नत खेती, नई किस्मों, पोषक तत्व प्रबंधन, फसल सुरक्षा और आधुनिक कृषि तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी दी गई।
PHM-6 किस्म पर वैज्ञानिकों का जोर
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. शंकर लाल जाट (अखिल भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना) ने कहा कि एमपीयूएटी द्वारा विकसित PHM-6 मक्का की ऐसी उन्नत किस्म है, जो अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और अलग-अलग कृषि-जलवायु परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन के कारण किसानों के लिए लाभदायक साबित हो रही है।
उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा किसानों के खेतों पर किए जा रहे फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन (FLDs) की सराहना करते हुए कहा कि इन प्रदर्शनों से नई तकनीक तेजी से गांवों तक पहुंच रही है और किसान वैज्ञानिक खेती अपनाकर अपनी आय बढ़ा रहे हैं।
बुवाई से लेकर खरपतवार नियंत्रण तक मिली पूरी जानकारी
अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन प्रभारी डॉ. हरीश कुमार सुमेरिया ने किसानों को वैज्ञानिक तरीके से बुवाई, उन्नत बीजों के चयन, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और समेकित फसल प्रबंधन की विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि यदि किसान विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार खेती करें तो उत्पादन लागत कम होगी और अधिक उपज के साथ बेहतर गुणवत्ता भी मिलेगी।
रोग और नेमाटोड से बचाव के उपाय भी बताए
कार्यक्रम में पादप सूत्रकृमि एवं पादप रोग विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक राम नारायण कुम्हार ने मक्का फसल में लगने वाले नेमाटोड (सूत्रकृमि) और प्रमुख रोगों की पहचान, शुरुआती लक्षण तथा उनके प्रभावी नियंत्रण के वैज्ञानिक उपाय बताए।
उन्होंने किसानों को नियमित रूप से फसल का निरीक्षण करने और समय रहते नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी, ताकि रोग और कीटों से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
किसानों ने पूछे सवाल, वैज्ञानिकों ने दिए समाधान
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान किसानों ने खेती से जुड़े विभिन्न तकनीकी सवाल वैज्ञानिकों के सामने रखे और उनका समाधान प्राप्त किया। किसानों ने इस पहल को उपयोगी बताते हुए भविष्य में भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित करने की मांग की।
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