कहानी
डॉ. अलका अग्रवाल
उस दिन कोविड वैक्सीन की दूसरी डोज़ लगवाने, स्कूल से ही दोनों शिक्षक, सुरेश जी और रामनाथ जी साथ – साथ ही अस्पताल चले गए। सुरेश जी को शाम से ही बुखार, गला खराब, शरीर में दर्द जैसे लक्षण प्रकट होने लगे। उन्हें लगा कि शायद टीका लगवाने के कारण ही ऐसा हो रहा है। लेकिन, उन्होंने कोविड की आशंका के कारण स्वयं को घर में ही आइसोलेट कर लिया। 3 दिन बाद भी जब हालत ठीक ना हुई तो उन्होंने कोविड टेस्ट कराया, जो पॉज़िटिव आया। वे डॉक्टर की सलाह ले कर दवाई लेने लगे। तब उन्हें ध्यान आया कि उनके साथी शिक्षक रामनाथ जी से भी बात करनी चाहिए, कहीं वे भी तो बीमार नहीं हो गए। लेकिन रामनाथ जी बिल्कुल ठीक थे। रामनाथ जी ने बीमारी में सहानुभूति दिखाना तो दूर रहा, उल्टे चुटकी लेते हुए कहा, ” भाभी जी का टेस्ट करा लिया क्या? उनको भी तो हो ही गया होगा, कोरोना।…. क्या कहा, नहीं हुआ? क्या बात है भाई , कोई संबंध नहीं है क्या दोनों में।”
कटाक्ष करते हुए रामनाथ जी ने कहा। सुरेश जी का पहले से दुखी मन और भी अधिक दुख से भर गया। कष्ट और पीड़ा के बीच भी व्यंग्य करने से नहीं चूकते हैं लोग। कैसी मानसिकता है ये। वे सोच ही रहे थे कि उनके मोबाइल की घंटी बजी। उनके स्कूल के ही दूसरे शिक्षक, इकबाल जी बोल रहे थे, ” सुरेश भाई साहब, आप तो बिल्कुल पराया समझते हैं हमें। मुझे तो आज ही पता चला कि आप कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं। दुख- सुख में अपने ही काम आते हैं। कोई भी जरूरत हो, तो मुझे बताएं। भाभीजी भी परेशान हो रही होंगी। हम लोग तो एक परिवार की तरह ही हैं। “
इकबाल जी की आत्मीयता और इंसानियत से भरी हमदर्दी ने उस घाव पर मरहम लगा दिया था, जो थोड़ी देर पहले रामनाथ जी ने दिया था। सुरेश जी ने कहा, “बिल्कुल इकबाल जी, ऐसे समय में आप जैसे लोगों का ही सहारा है। कोई जरूरत होने पर आपको ही बताएंगे।” अब सुरेश जी के चेहरे पर बीमारी में भी चमक थी और वे सोच रहे थे सच में दुनिया में भांति भांति के लोग होते हैं।
(लेखिका सेवानिवृत कॉलेज प्राचार्य हैं)
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