आज सुबह जैसे ही उमा चाय पीने बैठी उसका मोबाइल बज उठा। भाभी का फोन देख कर उसे चिंता हुई। दो तीन दिन से भाई रमन की तबियत ठीक नहीं थी। फोन उठाते ही भाभी रो पड़ीं, ” उमा तुम्हारे भैया हमें छोड़ गए ” ‘ इतनी तो
Category: साहित्य
अंतिम घड़ी…
80 वर्षीय दादाजी में जीने की अदम्य इच्छा थी। लेकिन पिछले दिनों, शहर में उनके कई परिचित, रिश्तेदार और मित्र एक-एक कर भगवान को प्यारे हो गए। इस कारण दादाजी की सकारात्मकता भी डगमगाने लगी और उनके मन में
ऐसी हैं आजकल की लड़कियां…
अब वे अन्याय नहीं सहतीं।
अब वे चुपचाप नहीं रहतीं।
अब वे बेबाक हो सब कहतीं।
ये शहर न होता तो …
ये शहर न होता तो मैं गांव में घर बनाता,
पक्की ईंटों से नहीं कच्ची मिट्टी से सजाता।
स्त्री बदल रही है…
मकान को घर बनाती,
तीज-त्यौहार पर श्रृंगार करती,
चूड़ी पायल खनकाती,
घर को गुलजार करती,
पुरस्कार की हकदार…
एक स्कूल में प्रार्थना सभा चल रही थी। हेड मास्टर साहब ने प्रातः अनन्या का नाम पुरस्कार हेतु घोषित किया। अनन्या को समझ में नहीं आया, उसे क्यों बुलाया जा रहा है? उसने तो ऐसा कोई
क्यों सुख चपला सा चमके…
यह दुनिया दर्द का दरिया,
पर यहीं हमें रहना है।
अश्रु को समझ कर मोती
जीवन अपना जीना है।
अपना ही गम
