मीठा हुआ फीका! चीनी से दूरी बढ़ा रहा देश | गुड़ की मिठास ने बदल दिया पूरा खेल

देश में हेल्थ अवेयरनेस (Health Awareness) बढ़ने और गुड़ (jaggery) की मांग तेज होने से चीनी (Sugar) की खपत में गिरावट आ रही है, सरकार ने नई चीनी मिलों (sugar mills) पर सख्त नियमों का प्रस्ताव रखा है।

नई हवा डैस्क 

देश की थाली में अब मिठास का स्वाद बदल रहा है। कभी तेजी से बढ़ती चीनी की खपत अब थम सी गई है। वजह साफ है—लोगों की सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता और गुड़ जैसे पारंपरिक विकल्पों की ओर झुकाव। इसी बदलते ट्रेंड ने सरकार को भी बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है।

देश में चीनी अब पहले जैसी ‘मीठी जरूरत’ नहीं रही। हेल्थ को लेकर सजग होती आबादी और सोशल मीडिया से मिल रही नई जानकारी ने लोगों की खानपान की आदतों में बड़ा बदलाव ला दिया है। अब चीनी की जगह गुड़ और खांडसारी जैसे पारंपरिक विकल्प तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। यही वजह है कि चीनी की खपत में पहले जैसी रफ्तार नहीं दिख रही।

अनुमान है कि साल 2025-26 में देश में करीब 280 लाख टन चीनी की खपत होगी, जो पिछले साल के आसपास ही रहेगी। कुछ विशेषज्ञ तो यह भी मान रहे हैं कि यह आंकड़ा और नीचे जा सकता है। साफ संकेत है—देश मीठा तो खा रहा है, लेकिन चीनी से दूरी बना रहा है।

इस बदलते ट्रेंड के बीच सरकार ने चीनी उद्योग को लेकर बड़ा प्रस्ताव रखा है। अब कोई भी नई चीनी मिल पहले से मौजूद मिल से कम से कम 25 किलोमीटर दूर ही लगाई जा सकेगी। पहले यह दूरी 15 किलोमीटर थी। यानी अब नई मिल खोलना आसान नहीं होगा। सरकार का मकसद है कि एक ही इलाके में मिलों की भीड़ न लगे और गन्ने की उपलब्धता पर दबाव न पड़े।

सिर्फ इतना ही नहीं, अगर कोई पुरानी चीनी मिल अपनी क्षमता बढ़ाना चाहती है, तो इसका फैसला अब राज्य सरकार के हाथ में होगा। राज्य सरकार यह देखेगी कि उस इलाके में पर्याप्त गन्ना है या नहीं, किसानों को नुकसान तो नहीं होगा और आसपास की मिलों पर इसका क्या असर पड़ेगा।

इधर, गांवों और छोटे शहरों में गुड़ और खांडसारी की मांग तेजी से बढ़ रही है। ये न सिर्फ सस्ते हैं, बल्कि इन्हें सेहत के लिए बेहतर भी माना जाता है। इसी बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार अब खांडसारी यूनिट्स को भी नियमों के दायरे में ला रही है।

देश में सैकड़ों खांडसारी यूनिट्स चल रही हैं, जिनमें कई बड़ी क्षमता वाली हैं। नए प्रस्ताव के तहत इन यूनिट्स को भी किसानों को वही कीमत देनी होगी, जो चीनी मिलें देती हैं। साथ ही उन्हें तय क्षेत्रों से ही गन्ना खरीदना होगा।

सरकार के इस प्रस्ताव का असर सीधा किसानों और उद्योग दोनों पर पड़ेगा। जहां किसानों को बेहतर और संतुलित कीमत मिलने की उम्मीद है, वहीं निवेशकों के लिए नई मिल लगाना अब चुनौती भरा हो सकता है।

फिलहाल सरकार ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक कर दिया है और 20 मई 2026 तक लोगों से सुझाव मांगे हैं। इसके बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा।

कुल मिलाकर, देश में बदलती खानपान की आदतें और हेल्थ को लेकर बढ़ती जागरूकता अब सिर्फ थाली ही नहीं, पूरे चीनी उद्योग की दिशा तय कर रही हैं। आने वाले समय में यह बदलाव कितना असर डालते हैं, इस पर सबकी नजर रहेगी।

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