जब प्यारा बचपन बीता था, तब खुश थे अब तो बड़े हुए, मन की करने का जज्बा था,
कभी फूल सा हल्का दिल भी, पत्थर सा भारी होता है, मनचाहे और अनचाहे में,
जब कंधे पर हाथ रख, कोई हौले से कहता है … मैं हूं ना,
कैसे पहचानें किसी को, एक चेहरे पर ढेरों चेहरे चढ़ा कर
कल तक सूने खड़े वृक्ष की, नव पल्लव ने झोली भर दी।
इंसानियत ढूढ़ें यहां, जो खो गई इस दौर में, हर कोई चाहे सच्चाई
मेहनतकश को है सज़ा यहां, नाकारा इज्जत पाते हैं, खुद का हक है सबको प्यारा
मेरे शहर को ये क्या हो गया, अमन ओ चैन का गुलिस्तां