उदयपुर
देशभर के कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) को अब सिर्फ किसानों तक तकनीक पहुँचाने की भूमिका से आगे बढ़कर वाणिज्यिक मॉडल अपनाने की जरूरत है। यह बात भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के सहायक महानिदेशक (कृषि प्रसार) डॉ. रंजय कुमार सिंह ने शुक्रवार को कही। वे उदयपुर में आयोजित क्षेत्रीय समीक्षा कार्यशाला के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे, जिसमें राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 67 केवीके के कार्यों की समीक्षा की गई।
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डॉ. सिंह ने कहा कि केवीके सरकारी योजनाओं और किसानों के बीच मजबूत लिंक हैं, लेकिन अब इन्हें अपने जिलों की विशिष्टताओं के आधार पर कमर्शियल इनिशिएटिव शुरू करने होंगे—जैसे फल–फूल प्रसंस्करण, डेरी आधारित उत्पाद, मत्स्य उत्पादन और अन्य स्थानीय संसाधन। उनके मुताबिक, खेती को लाभकारी बनाने में यह कदम निर्णायक साबित होगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवीके को अपने कामकाज का दस्तावेजी रिकॉर्ड रखना होगा, क्योंकि नीति स्तर पर कई फैसले इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर होते हैं। उन्होंने तीनों राज्यों के केवीके से पूछा कि पिछले पांच वर्षों में कौन-सी ऐसी उपलब्धि सामने आई है, जो अन्य केंद्रों के लिए बेंचमार्क बन सके।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) के कुलपति डॉ. प्रताप सिंह ने की। उन्होंने कहा कि बीज विकास एक लंबी प्रक्रिया है, इसलिए हर कुछ वर्षों में किस्म बदल देने की अपेक्षा व्यावहारिक नहीं है। उनका जोर था कि किसी भी कृषि कार्यक्रम की सफलता का मूल्यांकन उसके वास्तविक परिणाम और आउटपुट से ही किया जाना चाहिए।
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तीन दिन चली इस कार्यशाला में केवीके के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने स्थानीय समस्याओं, तकनीकी चुनौतियों और सफल मॉडलों पर अपनी रिपोर्टें प्रस्तुत कीं। कृषि क्षेत्र में ड्रोन तकनीक, प्राकृतिक खेती, फसल अवशेष प्रबंधन और विभिन्न राष्ट्रीय अभियानों में केवीके की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया गया। कार्यक्रम में देशभर से आए कृषि विशेषज्ञों ने भी अपनी राय रखी और सुझाव दिए।
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