डिग्री बनी बंधक, स्टाइपेंड में भेदभाव का आरोप | डीएमए ने सीएम मान, NHRC और NMC से की तत्काल कार्रवाई की मांग

डीएमए इंडिया ने AIMSR बठिंडा पर रेजिडेंट डॉक्टरों की डिग्रियां रोकने, स्टाइपेंड में असमानता और NMC नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान, NHRC, NMC और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से जांच और कार्रवाई की मांग की।

चंडीगढ़/नई दिल्ली। रेजिडेंट डॉक्टरों के अधिकारों को लेकर डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए इंडिया) ने बड़ा मोर्चा खोल दिया है। संगठन ने पंजाब के आदेश इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च (AIMSR), बठिंडा पर रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ कथित अन्याय, स्टाइपेंड में असमानता, डिग्रियां रोके जाने और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के नियमों के उल्लंघन जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

डॉ. अमित व्यास, राष्ट्रीय अध्यक्ष,डीएमए

डीएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. शुभ प्रताप सोलंकी और राष्ट्रीय कोर सदस्य डॉ. आर्यन श्रीवास्तव ने संबंधित अधिकारियों को भेजी शिकायत में आरोप लगाया है कि संस्थान में पोस्टग्रेजुएट रेजिडेंट डॉक्टरों को पंजाब के सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में काफी कम स्टाइपेंड दिया जा रहा है, जो NMC की स्टाइपेंड समानता नीति की भावना के विपरीत प्रतीत होता है।

सबसे गंभीर आरोप 2021 बैच के पोस्टग्रेजुएट डॉक्टरों से जुड़ा है। डीएमए का दावा है कि कई डॉक्टर फरवरी 2025 में अपनी पढ़ाई पूरी कर अंतिम परीक्षा पास कर चुके हैं, लेकिन उन्हें अब तक डिग्रियां, प्रमाणपत्र और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज नहीं दिए गए हैं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ डॉक्टरों पर डिग्री लेने के लिए शपथपत्र और अन्य दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया जा रहा है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास ने कहा कि किसी डॉक्टर की डिग्री और प्रमाणपत्र रोकना केवल प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि उसके रोजगार, उच्च शिक्षा, सुपर-स्पेशियलिटी प्रशिक्षण, प्रोफेशनल पंजीकरण और आजीविका के अधिकार पर सीधा प्रहार है।

डीएमए ने यह भी आरोप लगाया कि रेजिडेंट डॉक्टरों से सप्ताह में 70 से 80 घंटे तक काम कराया जा रहा है, जबकि उन्हें पर्याप्त आर्थिक और संस्थागत समर्थन उपलब्ध नहीं कराया जा रहा। संगठन के अनुसार इससे युवा डॉक्टरों पर मानसिक, शारीरिक और पेशेवर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

डीएमए पदाधिकारियों का कहना है कि यह मामला केवल NMC नियमों के कथित उल्लंघन तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा डॉक्टरों के मौलिक अधिकारों और गरिमा से भी जुड़ा हुआ है। संगठन ने स्पष्ट कहा कि किसी भी संस्थान को डॉक्टरों के भविष्य को बंधक बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

राष्ट्रीय महासचिव डॉ. शुभ प्रताप सोलंकी ने कहा कि देशभर के रेजिडेंट डॉक्टरों के अधिकारों की रक्षा डीएमए की प्राथमिकता है और दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित होने तक संगठन अपनी लड़ाई जारी रखेगा।

डीएमए की प्रमुख मांगें

  • AIMSR, बठिंडा की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।
  • स्टाइपेंड भुगतान और NMC नियमों के अनुपालन की जांच की जाए।
  • रोकी गई सभी डिग्रियां, प्रमाणपत्र और शैक्षणिक दस्तावेज तत्काल जारी किए जाएं।
  • रेजिडेंट डॉक्टरों के कार्य घंटे और कार्य परिस्थितियों का ऑडिट कराया जाए।
  • दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और प्रबंधन के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।

डॉ. अमित व्यास ने कहा कि देश के सभी मेडिकल संस्थानों को कानून, पारदर्शिता और मानवाधिकारों के दायरे में रहकर कार्य करना होगा तथा युवा डॉक्टरों के भविष्य से किसी भी प्रकार का खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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