बयाना नगरपालिका चुनाव से पहले बड़ा सियासी फेरबदल हुआ है। कांग्रेस के निवर्तमान चेयरमैन विनोद कुमार अग्रवाल बट्टा समेत करीब डेढ़ दर्जन पार्षद और सैकड़ों कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल हो गए।
बयाना (भरतपुर)। बयाना नगरपालिका चुनाव में अभी नामांकन का पर्चा तक नहीं भरा गया, लेकिन सियासी मैदान में एक बड़ा दांव चल गया। कांग्रेस के साथ नगरपालिका की कमान संभाल चुके विनोद कुमार अग्रवाल बट्टा ने अचानक बीजेपी का रुख कर लिया। मामला यहीं नहीं रुका—उनके साथ निवर्तमान उपाध्यक्ष मंजू दिनेश महलोनी, पूर्व चेयरमैन उषा अग्रवाल, करीब डेढ़ दर्जन निवर्तमान पार्षद और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता भी बीजेपी के खेमे में पहुंच गए।
बुधवार को भरतपुर के एक होटल में जिस अंदाज में बयाना का यह सियासी काफिला पहुंचा, उसने चुनाव से पहले ही माहौल गरमा दिया। करीब 50 वाहनों के काफिले के साथ पहुंचे नेताओं और समर्थकों की मौजूदगी ने साफ कर दिया कि यह महज एक नेता की पार्टी बदलने की घटना नहीं है। स्थानीय निकाय चुनाव से ठीक पहले बयाना में एक बड़ा राजनीतिक समूह अपना पाला बदल चुका है।
इस पूरे घटनाक्रम की जमीन पिछले तीन दिनों में तैयार हुई। बयाना में तभी से कानाफूसी चल रही थी कि निवर्तमान अध्यक्ष बीजेपी में जाने वाले हैं। चर्चाओं के बीच नगरपालिका के एक पूर्व पार्षद ने दोनों पक्षों के बीच संपर्क की भूमिका निभाई। करीब तीन दिन पहले विनोद कुमार अग्रवाल बट्टा को जयपुर ले जाया गया। वहां निकाय चुनावों के लिए बीजेपी के संभाग प्रभारी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी से उनकी मुलाकात हुई। इसके बाद जो बातचीत शुरू हुई, उसने बुधवार को राजनीतिक फैसले का रूप ले लिया।
भरतपुर में हुए कार्यक्रम में अशोक परनामी के साथ बीजेपी जिलाध्यक्ष शिवानी दायमा और प्रभारी नरेश बंसल मौजूद रहे। बयाना से पहुंचे नेताओं, पार्षदों और कार्यकर्ताओं को पार्टी में शामिल कराया गया।
बयाना की राजनीति में क्यों अहम है यह एंट्री?
विनोद कुमार अग्रवाल बट्टा का बीजेपी में जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उनके साथ नगरपालिका के मौजूदा राजनीतिक ढांचे से जुड़े कई चेहरे भी बीजेपी में चले गए हैं। करीब डेढ़ दर्जन निवर्तमान पार्षदों और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने इस बदलाव को और वजन दे दिया है।
अब चर्चा सिर्फ इस बात की नहीं है कि कौन किस पार्टी में गया, बल्कि यह है कि बयाना नगरपालिका के आगामी बोर्ड की लड़ाई में इस नए समीकरण का कितना असर पड़ेगा। निवर्तमान अध्यक्ष के बीजेपी खेमे में जाने के बाद स्थानीय राजनीति में संभावित उम्मीदवारों और बोर्ड गठन को लेकर नई गणित बैठाई जाने लगी है।
लेकिन चुनाव से पहले किसी भी समीकरण को अंतिम परिणाम मानना जल्दबाजी होगी। अभी नामांकन होना है, प्रत्याशियों के चेहरे सामने आने हैं और उसके बाद मतदाताओं का फैसला आना है। चुनावी आचार संहिता लागू होने के कारण इस घटनाक्रम को किसी दल या व्यक्ति के पक्ष में प्रचार के बजाय राजनीतिक दल-बदल और चुनावी गतिविधि के तौर पर देखना ही उचित होगा।
इतना जरूर है कि बयाना में चुनावी मुकाबले की शुरुआत नामांकन से पहले ही एक बड़े सियासी झटके के साथ हो गई है। कांग्रेस से जुड़े निवर्तमान नगरपालिका नेतृत्व के एक बड़े हिस्से का बीजेपी में जाना अब आने वाले दिनों की टिकट राजनीति और उम्मीदवारों के समीकरण को भी प्रभावित करने वाली चर्चा का केंद्र बन गया है।
अब असली तस्वीर नामांकन के बाद सामने आएगी—कौन किसके सामने उतरेगा और आज का यह सियासी फेरबदल वोट में कितना बदल पाएगा, इसका जवाब चुनाव परिणाम ही देंगे।
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