भेदभाव
डॉ. शिखा अग्रवाल
इस सृष्टि के जन्मविधाता,
पालनहार तुम्ही हो दाता,
भेदभाव सब में क्यों इतना,
ये मन को कुछ समझ ना आता।
जीवन सबका नहीं एक सा,
कुछ को संघर्षों ने पाला,
सर्दी – गर्मी मौसम बदला,
कोई ना लाता कभी उजाला।
वह मासूम खुले में सोता,
तेज कड़कती ठंड में रोता,
बोरी का इक टुकड़ा भर ही,
उसका सुघड़ बिछौना होता।
दिनभर पत्थर ढोती माता,
ध्यान उसी नन्हे पर रहता,
इस बदहाली में भी ममता,
नहीं भूलती नज़र दिठौना।
मेहनतकश का जीना मुश्किल,
दर-दर की है ठोकर खाता,
सिर पर छत ना पैसा होता,
फिर भी खुद्दारी से जीता।
दो रोटी की आस में इंसा,
दिन भर कोल्हू बैल सा पिसता,
शाम ढले जब खाना पकता,
पेट कभी पूरा ना भरता।
कैसी नियति हे ईश्वर ये,
सब ही तो संतान तुम्हारी,
फिर क्यों इतना फर्क जहां में,
इक को रोटी भी मुश्किल से,
इक को सोने की थाली में।
(लेखिका राजकीय महाविद्यालय, सुजानगढ़ में सह आचार्य हैं)
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