उदयपुर के महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के डॉ. एन.एल. पंवार, डॉ. विनोद सहारण और डॉ. देवेंद्र जैन को 2026 की स्टैनफोर्ड–एल्सेवियर शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में जगह मिली।
उदयपुर। जैव प्रौद्योगिकी से लेकर नैनो-उर्वरक और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों तक, उदयपुर के महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) के तीन वैज्ञानिकों ने अपने शोध के दम पर अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की है। डॉ. एन.एल. पंवार, डॉ. विनोद सहारण और डॉ. देवेंद्र जैन को वर्ष 2026 की स्टैनफोर्ड–एल्सेवियर विश्व के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में जगह मिली है।
तीनों वैज्ञानिक अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। उनके शोध का दायरा जैव प्रौद्योगिकी और नैनोकणों के उपयोग से लेकर कृषि में पोषक तत्वों की दक्षता बढ़ाने तथा स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों के विकास तक फैला है।
किसी का फोकस नैनो-उर्वरक, तो कोई स्वच्छ ऊर्जा पर कर रहा काम
डॉ. देवेंद्र जैन जैव प्रौद्योगिकी, सूक्ष्मजीव जैव प्रौद्योगिकी और नैनोकणों के साथ-साथ पादपों में उनके अनुप्रयोगों पर अनुसंधान कर रहे हैं।
वहीं, डॉ. विनोद सहारण का शोध सतत कृषि के लिए अगली पीढ़ी के नैनो-उर्वरक विकसित करने और पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित है।
डॉ. एन.एल. पंवार स्वच्छ और ऊर्जा-कुशल तकनीकों के विकास में जुटे हैं। उनके कार्यक्षेत्र में उन्नत चूल्हे, बायोमास गैसीफायर और सौर तापीय उपकरण शामिल हैं। इन तीनों वैज्ञानिकों के शोध क्षेत्र अलग हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के लिए उनकी साझा उपलब्धि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान से जुड़ी है।
शोध-पत्रों से पेटेंट तक उल्लेखनीय योगदान
विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने तीनों वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए उनके शोध योगदान की सराहना की। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में अनेक शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं। इसके अलावा, विभिन्न नवाचारों और आविष्कारों के लिए पेटेंट हासिल किए हैं तथा महत्वपूर्ण पुस्तकों और शोधपरक साहित्य का लेखन भी किया है।
कुलगुरु ने उम्मीद जताई कि तीनों वैज्ञानिक आगे भी उच्च गुणवत्ता वाले शोध और नवाचार के साथ समाज के लिए उपयोगी वैज्ञानिक तकनीकों के विकास में योगदान देंगे। उन्होंने कहा कि उनकी उपलब्धियां विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाने के साथ युवा वैज्ञानिकों और शोधार्थियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती हैं।
कैसे तय होती है शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची?
स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की विकसित पद्धति और एल्सेवियर के सहयोग से प्रकाशित यह सूची शोध के प्रभाव का आकलन करने के लिए तैयार की जाती है। इसमें उद्धरणों की संख्या, एच-इंडेक्स, सह-लेखकों की संख्या के समायोजन से जुड़े संकेतकों और अन्य संयुक्त उद्धरण-आधारित मानकों को शामिल किया जाता है।
वर्ष 2026 की सूची में एकल-वर्षीय शोध प्रभाव का आकलन वर्ष 2025 के दौरान मिले उद्धरणों के आधार पर किया गया है। उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, इस एकल-वर्षीय सूची में भारत के 6,954 शोधकर्ता शामिल हैं। इसी वैश्विक सूची में जगह बनाकर एमपीयूएटी के तीन वैज्ञानिकों ने विश्वविद्यालय को गौरवान्वित किया है।
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