महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर अपनी खाली जमीन, भवन, शोध और वेस्ट टू वेल्थ मॉडल से आय बढ़ाने की तैयारी में है। कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने रणनीति पर जोर दिया।
उदयपुर। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय अब सिर्फ पढ़ाई और शोध तक सीमित रहने के बजाय अपनी उपलब्ध जमीन, भवन, मानव संसाधन और अनुसंधान सुविधाओं को आय के नए साधन में बदलने की तैयारी कर रहा है। विश्वविद्यालय की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने ऐसी कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया है, जिसमें परिसर की खाली जमीन से लेकर अनुपयोगी भवनों और कचरे तक का उपयोग कमाई के लिए किया जा सके।
राजस्थान कृषि महाविद्यालय के बैठक कक्ष में विभागाध्यक्षों, वरिष्ठ प्राध्यापकों, अनुसंधान वैज्ञानिकों और संकाय सदस्यों के साथ हुई बैठक में कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय के पास मौजूद हर संसाधन का रचनात्मक, वैज्ञानिक और व्यावसायिक इस्तेमाल होना चाहिए। उन्होंने सभी इकाइयों को अपनी क्षमता के अनुसार नए आय-सृजन के विकल्प तलाशने और उनके लिए ठोस व समयबद्ध कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए।
खाली जमीन अब सिर्फ हरियाली नहीं, कमाई का जरिया भी बनेगी
कुलगुरु ने विश्वविद्यालय परिसर की खाली और अनुपयोगी जमीन के इस्तेमाल पर खास जोर दिया। उन्होंने मूंग, गेंदा और अन्य लाभकारी फूलों की खेती को बढ़ावा देने के निर्देश दिए, ताकि परिसर का सौंदर्य बढ़ाने के साथ कृषि एवं पुष्प उत्पादन से अतिरिक्त आय भी अर्जित की जा सके।
उन्होंने परिसर में लगी ड्यूरांटा की हेज को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उसकी जगह कम ऊंचाई वाली उपयोगी और फलदार प्रजातियां लगाने की संभावनाएं तलाशने को कहा। इनमें बौनी किस्म का जामुन, करौंदा, कटहल और सहजन जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
कुलगुरु का जोर ऐसी हरित व्यवस्था विकसित करने पर रहा, जो देखने में आकर्षक होने के साथ विश्वविद्यालय के लिए उपयोगी और आर्थिक रूप से लाभकारी भी हो।
खाली भवनों को किराये पर देकर बढ़ेगा राजस्व
विश्वविद्यालय में लंबे समय से खाली या अनुपयोगी पड़े भवनों को भी अब राजस्व के नजरिये से देखने की तैयारी है। कुलगुरु ने ऐसे भवनों का सर्वे कराने और उनकी उपयोगिता के आधार पर उपयुक्त भवनों को किराये पर देने की संभावनाएं तलाशने को कहा।
महाविद्यालय की कैंटीन सहित अन्य उपलब्ध सुविधाओं के बेहतर प्रबंधन से भी आय बढ़ाने के विकल्प तलाशने पर बैठक में चर्चा हुई।
शोध सिर्फ कागज पर नहीं, फंडिंग भी लाएगा
आर्थिक आत्मनिर्भरता की रणनीति में शोध को भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने शिक्षकों और वैज्ञानिकों से अधिक संख्या में गुणवत्तापूर्ण परियोजना प्रस्ताव तैयार कर विभिन्न वित्त पोषण एजेंसियों को भेजने का आह्वान किया।
उनका कहना था कि बाहरी वित्त पोषण से विश्वविद्यालय में शोध, नवाचार और अधोसंरचना विकास को गति मिलेगी और साथ ही अतिरिक्त वित्तीय संसाधन भी उपलब्ध होंगे।
‘Waste to Wealth’ से कचरा बनेगा कमाई का संसाधन
बैठक में ‘Waste to Wealth’ की अवधारणा को विश्वविद्यालय की आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने पर भी विशेष जोर दिया गया। विश्वविद्यालय में निकलने वाले विभिन्न प्रकार के अपशिष्टों के वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ उनसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं तलाशने के निर्देश दिए गए।
डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि अपशिष्ट को सिर्फ समस्या मानने के बजाय उसे संसाधन और आर्थिक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
पुरानी संपत्तियों का होगा इस्तेमाल, बेकार चीजों का निस्तारण
कुलगुरु ने अनुपयोगी और सेवा-योग्य नहीं रह गई वस्तुओं के समयबद्ध निस्तारण या राइट-ऑफ की प्रक्रिया पर भी ध्यान देने को कहा। इसके साथ ही अनुपयोगी भवनों और परिसरों के रेनॉवेशन तथा दोबारा उपयोग की संभावनाओं पर काम करने के निर्देश दिए गए।
उनका कहना था कि लंबे समय से बेकार पड़ी परिसंपत्तियों का बेहतर प्रबंधन उन्हें दोबारा उपयोगी बना सकता है और इससे विश्वविद्यालय की आर्थिक दक्षता भी बढ़ेगी।
शोध की खेत से लैब तक निगरानी होगी
डॉ. प्रताप सिंह ने शिक्षकों और वैज्ञानिकों से शोधकर्ताओं के अनुसंधान कार्य तथा शोध परीक्षणों की नियमित निगरानी करने को कहा। उन्होंने खेत और प्रयोगशाला दोनों स्तरों पर निरीक्षण की व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए।
उन्होंने कहा कि शोध का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब उसका काम गुणवत्तापूर्ण हो और उसके परिणाम किसानों तथा अन्य हितधारकों के व्यावहारिक उपयोग तक पहुंचें।
आइडिया दीजिए, विश्वविद्यालय कमाई का रास्ता खोजेगा
बैठक में कुलगुरु ने आर्थिक आत्मनिर्भरता को किसी एक विभाग की जिम्मेदारी मानने के बजाय पूरे विश्वविद्यालय की सामूहिक जिम्मेदारी बताया। उन्होंने शिक्षकों, वैज्ञानिकों और कर्मचारियों से अपने स्तर पर आय बढ़ाने के नए और व्यवहारिक उपाय सुझाने को कहा।
उन्होंने साफ किया कि विश्वविद्यालय की आय बढ़ाने के लिए कोई भी नया, व्यवहारिक और नवाचारपूर्ण विचार सामने आता है तो उसे प्रोत्साहित किया जाएगा।
डॉ. लोकेश गुप्ता ने दी महाविद्यालय की गतिविधियों की जानकारी
बैठक की शुरुआत राजस्थान कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. लोकेश गुप्ता ने कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह का स्वागत कर की। उन्होंने महाविद्यालय की शैक्षणिक, अनुसंधान और अन्य गतिविधियों की जानकारी प्रस्तुत की।
बैठक के अंत में डॉ. लोकेश गुप्ता ने कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह, विभागाध्यक्षों, वरिष्ठ प्राध्यापकों, अनुसंधान वैज्ञानिकों और सभी संकाय सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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