भाजपा ने राष्ट्रीय महामंत्री बनने के अगले ही दिन सतीश पूनिया को पंजाब का प्रभारी बनाया। हरियाणा और दिल्ली के चुनावी अनुभव के बाद अब पंजाब में संगठन मजबूत करने की चुनौती।
जयपुर। भाजपा ने सतीश पूनिया को एक और बड़ी जिम्मेदारी देकर साफ कर दिया है कि अब उनकी भूमिका सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं रहने वाली। राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने के अगले ही दिन पार्टी ने उन्हें पंजाब का प्रदेश प्रभारी नियुक्त कर दिया। लगातार दो दिनों में मिली इन दोनों जिम्मेदारियों ने भाजपा के भीतर पूनिया की बढ़ती भूमिका को लेकर नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पूनिया को पंजाब का प्रभारी बनाया गया है। बड़ा सवाल यह है कि भाजपा ने पंजाब जैसे चुनौतीपूर्ण राज्य के लिए पूनिया को ही क्यों चुना? पार्टी के सामने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को खड़ा करने, ग्रामीण इलाकों में पैठ बनाने और किसान मुद्दे पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की चुनौती है। ऐसे में हरियाणा में विपरीत राजनीतिक माहौल के बावजूद भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने वाले पूनिया के संगठनात्मक अनुभव को पार्टी ने पंजाब में आजमाने का फैसला किया है।
एक दिन पहले राष्ट्रीय महामंत्री, अगले दिन पंजाब की कमान
भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम में सोमवार को सतीश पूनिया को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया था। इसके ठीक अगले दिन मंगलवार को उन्हें पंजाब का प्रभारी घोषित कर दिया गया।
राष्ट्रीय कार्यालय प्रभारी एवं राज्यसभा सांसद तरुण चुग की ओर से जारी सूची में पंजाब के साथ उत्तर प्रदेश और गुजरात के लिए भी नए प्रभारियों की घोषणा की गई है। पंजाब की जिम्मेदारी पूनिया, उत्तर प्रदेश की विनोद तावड़े और गुजरात की जिम्मेदारी तरुण चुग को दी गई है। सभी नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू होंगी।
यानी पूनिया के लिए संगठन में भूमिका बढ़ने की रफ्तार असामान्य रूप से तेज रही है। कुछ समय पहले राजस्थान से राज्यसभा पहुंचने के बाद अब राष्ट्रीय महामंत्री और फिर पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्य का प्रभार मिलना उनके राजनीतिक सफर में एक नया मोड़ माना जा रहा है।
हरियाणा का अनुभव पंजाब में कितना काम आएगा?
पूनिया की पंजाब में नियुक्ति के पीछे सबसे मजबूत कड़ी उनका हरियाणा अनुभव माना जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले मार्च में उन्हें हरियाणा का चुनाव प्रभारी बनाया गया था। लोकसभा चुनाव में भाजपा को 10 में से 5 सीटें मिलीं। इसके बाद जुलाई में उन्हें हरियाणा भाजपा का प्रदेश प्रभारी बनाया गया। लेकिन असली परीक्षा विधानसभा चुनाव में हुई।
हरियाणा में किसान आंदोलन, पहलवानों के आंदोलन और जाट नाराजगी जैसे मुद्दों को भाजपा के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा था। इसके बावजूद विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 90 में से 48 सीटें जीत लीं। कांग्रेस 37 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने लगातार तीसरी बार सरकार बना ली। 2019 के मुकाबले भाजपा की सीटें भी 40 से बढ़कर 48 हो गईं। यही वह प्रदर्शन है जिसने पूनिया के संगठनात्मक कौशल को पार्टी के भीतर नई मजबूती दी। हरियाणा में जिस राजनीतिक माहौल को भाजपा के खिलाफ माना जा रहा था, उसी माहौल में पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने की रणनीति अब पंजाब में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
दिल्ली का ‘पांच सीटों वाला’ रिकॉर्ड भी चर्चा में
पूनिया के चुनावी प्रबंधन का एक और उदाहरण 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव है। उन्हें नजफगढ़ जिले की पांच विधानसभा सीटों—नजफगढ़, विकासपुरी, उत्तम नगर, मटियाला और द्वारका—की चुनावी जिम्मेदारी दी गई थी। भाजपा ने पांचों सीटों पर जीत हासिल की।
पूनिया ने वहां बूथ सम्मेलन, पन्ना प्रमुख सम्मेलन, ओबीसी सम्मेलन और प्रवासी राजस्थानी सम्मेलन सहित कई संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। हालांकि इसे पूरे दिल्ली चुनाव की सफलता के रूप में देखना ठीक नहीं होगा, क्योंकि उनके जिम्मे केवल पांच सीटें थीं। लेकिन जिन पांच सीटों का प्रबंधन उन्हें दिया गया था, वहां भाजपा का प्रदर्शन शत-प्रतिशत रहा।
अब असली मुकाबला पंजाब की जमीन पर होगा
पंजाब भाजपा के लिए हरियाणा से अलग तरह की चुनौती है। यहां पार्टी को सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि संगठन का विस्तार भी करना है। ग्रामीण पंजाब में भाजपा की पकड़ बढ़ाना, किसान मुद्दे पर पार्टी के प्रति भरोसा बनाना, बूथ स्तर का नेटवर्क मजबूत करना और जाट-सिख राजनीतिक समीकरणों को समझना पूनिया के सामने प्रमुख चुनौतियां होंगी।
इसके अलावा पंजाब की राजनीति में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच बदलते समीकरण भी भाजपा की रणनीति को प्रभावित करेंगे। भविष्य में अकाली दल के साथ रिश्तों को लेकर बनने वाली संभावनाएं भी पार्टी के लिए अहम हो सकती हैं। यानी पूनिया को पंजाब में तैयार संगठन नहीं मिला है, बल्कि संगठन को चुनाव के लिए तैयार करने का काम मिला है।
राजस्थान में भी पढ़े जाएंगे इस फैसले के मायने
पूनिया की नई जिम्मेदारी का असर राजस्थान भाजपा की राजनीति पर भी पड़ सकता है। पूनिया करीब चार साल तक राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे। उनके अध्यक्ष रहते 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की 25 में से 24 सीटें जीती थीं, जबकि सहयोगी आरएलपी ने एक सीट जीतकर एनडीए को सभी 25 सीटों पर जीत दिलाई थी।
हालांकि 2023 के विधानसभा चुनाव के समय वे प्रदेश अध्यक्ष नहीं थे। चुनाव से करीब आठ महीने पहले उन्हें अध्यक्ष पद से हटाकर सीपी जोशी को जिम्मेदारी दी गई थी। खुद पूनिया आमेर विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद राष्ट्रीय संगठन में उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गई। अब राज्यसभा सांसद, राष्ट्रीय महामंत्री और पंजाब प्रभारी के रूप में उनके पास एक साथ कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं।
पंजाब की जिम्मेदारी या राष्ट्रीय राजनीति में अगला पड़ाव?
सतीश पूनिया की नई जिम्मेदारी को केवल पंजाब के संगठनात्मक फेरबदल के तौर पर देखना शायद जल्दबाजी होगी। भाजपा ने जिस समय उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री बनाया और उसके तुरंत बाद पंजाब की कमान दी, वह अपने आप में पार्टी के भरोसे का संकेत है।
पंजाब में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन पूनिया के लिए काम अब शुरू हो चुका है। उन्हें यह साबित करना होगा कि हरियाणा में चुनौतीपूर्ण माहौल के बीच भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने वाला संगठनात्मक मॉडल पंजाब की जमीन पर भी दोहराया जा सकता है या नहीं।
और यही इस नियुक्ति का सबसे बड़ा सस्पेंस है—क्या भाजपा ने पूनिया को पंजाब इसलिए भेजा है कि वहां संगठन को मजबूत किया जा सके, या पार्टी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े संगठनात्मक रणनीतिकार के रूप में तैयार कर रही है?
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