उदयपुर में एमपीयूएटी के कार्यक्रम में कार्बन-न्यूट्रल खेती, कार्बन लेखांकन, सतत कृषि और कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं पर विशेषज्ञों ने चर्चा की।
उदयपुर। खेती में उत्पादन बढ़ाने के साथ अब कार्बन उत्सर्जन को कम करना भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसी मुद्दे पर उदयपुर में कृषि विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों ने कार्बन लेखांकन से लेकर कार्बन-न्यूट्रल खेती तक के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। यहां यह भी जोर दिया गया कि कार्बन की गणना केवल आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि उसका इस्तेमाल खेतों में बेहतर कृषि प्रबंधन के फैसले लेने में होना चाहिए।
फॉस्फेट रिच ऑर्गेनिक मैन्योर (प्रोम) सोसाइटी और महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी), उदयपुर के राजस्थान कृषि महाविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग की ओर से निदेशालय अनुसंधान में “कृषि में कार्बन लेखांकन : कार्बन-न्यूट्रल खेती” विषय पर अतिथि व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि को जलवायु-स्मार्ट, संसाधन-कुशल और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ बनाने के लिए कार्बन लेखांकन, कार्बन-न्यूट्रल फार्म, सतत कृषि पद्धतियों और कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
बढ़ते कार्बन उत्सर्जन को लेकर क्या बोले कुलपति
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. प्रताप सिंह, कुलपति, एमपीयूएटी, उदयपुर ने कहा कि मानवीय गतिविधियों के कारण कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। सतत भविष्य के लिए उत्सर्जन को कम करना जरूरी है। उन्होंने कृषि के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में जैविक एवं प्राकृतिक खेती को महत्वपूर्ण उपाय बताया। प्रो. प्रताप सिंह ने विशेष रूप से लघु एवं सीमांत किसानों को वैज्ञानिक कार्बन लेखांकन से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
केवल हिसाब नहीं, खेती के फैसलों से जुड़ना चाहिए कार्बन लेखांकन
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. आर. एस. यादव, प्रधान वैज्ञानिक, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, आईसीएआर एवं कार्यवाहक निदेशक, काफरी, झांसी ने जलवायु परिवर्तन और सतत कृषि के संदर्भ में कार्बन लेखांकन की बढ़ती उपयोगिता पर बात रखी। उन्होंने कहा कि कार्बन लेखांकन सिर्फ सैद्धांतिक गणना तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे वास्तविक कृषि प्रबंधन से जोड़ने की जरूरत है। किसानों को अपने खेतों में कार्बन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों की पहचान करने, उत्सर्जन का वैज्ञानिक आकलन करने और उपयुक्त तकनीकों के जरिए कृषि के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में सक्षम बनाया जाना चाहिए।
डॉ. यादव ने किसानों के साथ-साथ विद्यार्थियों और शिक्षकों में कार्बन लेखांकन तथा कार्बन-न्यूट्रल खेती को लेकर जागरूकता और क्षमता निर्माण पर भी विशेष जोर दिया।
प्रोम के महत्व और कार्बन मानकों पर भी चर्चा
इस अवसर पर डॉ. एस. के. शर्मा, अध्यक्ष, प्रोम सोसाइटी एवं सहायक महानिदेशक (मानव संसाधन प्रबंधन), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने प्रोम के महत्व और इसके विकास एवं प्रसार में सोसाइटी के संस्थापकों के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कार्बन लेखांकन की वैज्ञानिक पद्धति के साथ उत्सर्जन और कार्बन हटाने के आकलन तथा मान्यता प्राप्त कार्बन मानकों और सत्यापन प्रणालियों की आवश्यकता पर भी चर्चा की।
कृषि शिक्षा में कार्बन प्रबंधन की जरूरत
डॉ. के. के. यादव, डीन, कृषि महाविद्यालय, भीलवाड़ा ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने मौजूदा जलवायु परिवर्तन परिदृश्य में कार्बन लेखांकन की उपयोगिता बताते हुए कहा कि किसानों, विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए यह विषय लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। उन्होंने कृषि क्षेत्र के भावी मानव संसाधन को कार्बन प्रबंधन और जलवायु-स्मार्ट कृषि से जुड़े ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक दक्षताओं से सशक्त बनाने की आवश्यकता बताई।
कार्यक्रम में निदेशक अनुसंधान डॉ. मनोज महला, क्षेत्रीय अनुसंधान निदेशक डॉ. श्रीधर सिंह लखावत, डॉ. बी. एल. मीणा सहित प्रोम सोसाइटी के कई सदस्य, मृदा विज्ञान विभाग के संकाय सदस्य और विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में डॉ. रविकांत शर्मा, उप निदेशक अनुसंधान, एमपीयूएटी, उदयपुर ने आभार व्यक्त किया।
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