20 जुलाई की हिंसा के बाद पहली बार घायल पुलिसकर्मियों के परिवार सामने आए। खून से लथपथ वर्दी, अस्पताल में जिंदगी की जंग और सोशल मीडिया ट्रायल की दर्दभरी कहानी पढ़िए।
नई दिल्ली। कैमरों ने 20 जुलाई की हिंसा दिखाई थी, लेकिन उन दरवाजों के भीतर पसरे सन्नाटे को किसी ने नहीं देखा, जहां रात को ड्यूटी से लौटने वाले पुलिसकर्मी खून से सनी वर्दी में घर पहुंचे थे। कहीं पत्नी अपने पति के सिर से बहता खून रोक रही थी, कहीं बेटी पहली बार अपने पिता को उस हालत में देखकर सिसक उठी और कहीं बूढ़े माता-पिता यह सोचकर कांप रहे थे कि कुछ मिनट और देर हो जाती तो शायद उनका बेटा लौटकर ही नहीं आता।
करीब दस दिन तक चुप रहने के बाद शुक्रवार को इन पुलिसकर्मियों के परिवार पहली बार मीडिया के सामने आए। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस कम और उन घरों की दास्तान ज्यादा थी, जिनकी पीड़ा अब तक किसी बहस का हिस्सा नहीं बन सकी थी।
उनका दर्द सिर्फ उन घावों का नहीं था, जो लाठियों, पत्थरों और हमलों से शरीर पर लगे। उनकी शिकायत उस ‘दूसरी लड़ाई’ से भी थी, जो अस्पताल के बिस्तरों और सोशल मीडिया के बीच एक साथ लड़ी गई। परिवारों का कहना था कि जब उनके अपने जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे थे, तब सोशल मीडिया पर उन्हीं पुलिसकर्मियों को कठघरे में खड़ा किया जा रहा था, जैसे पूरी कहानी का दूसरा पक्ष कोई था ही नहीं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई परिजन अपनी बात कहते-कहते भावुक हो गए। एक घायल पुलिसकर्मी के परिजन ने कहा, “उस रात जब पिताजी घर लौटे तो उनकी खाकी वर्दी खून से पूरी तरह लाल हो चुकी थी। सिर और हाथों पर गहरी चोटें थीं। हम समझ ही नहीं पा रहे थे कि पहले उनका इलाज कराएं या खुद को संभालें।”
दिल्ली पुलिस के एक एसीपी की पत्नी अवनीत कौर ने उस रात को याद करते हुए कहा कि जब उनके पति घायल अवस्था में घर पहुंचे तो पूरा परिवार सदमे में था। उनके मुताबिक, दो साल की बेटी अपने पिता को उस हालत में देखकर सहम गई थी। उन्होंने कहा, “लोग सिर्फ वर्दी देखते हैं, लेकिन उसके पीछे एक पूरा परिवार होता है, जो हर ड्यूटी के बाद अपने बेटे, पति या पिता के सुरक्षित लौटने का इंतजार करता है। उस रात हमें एहसास हुआ कि किसी हिंसक भीड़ का निशाना सिर्फ पुलिसकर्मी नहीं बनता, उसका परिवार भी बन जाता है।”
एक घायल सब-इंस्पेक्टर की बेटी ने बताया कि उनके पिता पहले भारतीय नौसेना में मरीन कमांडो रह चुके हैं और करीब 15 साल तक देश की सेवा कर चुके हैं। पुलिस सेवा में आने के बाद भी उन्होंने हमेशा ड्यूटी को सर्वोपरि रखा। बेटी के मुताबिक, पिछले कुछ समय से उनके पिता घर आकर कहा करते थे कि प्रदर्शन अब सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं रहा, उसमें असामाजिक तत्व भी शामिल हो चुके हैं।
उसने बताया कि प्रदर्शन के दौरान बैरिकेडिंग पर तैनात उनके पिता को भीड़ ने घेर लिया और उन पर जानलेवा हमला किया। परिवार का दावा है कि हमले के बाद वे चार घंटे से अधिक समय तक घटनास्थल पर बेहोश पड़े रहे। बाद में साथी पुलिसकर्मी उन्हें किसी तरह सुरक्षित निकालकर अस्पताल ले गए।
बेटी ने कहा, “हम अस्पताल में उनके होश में आने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन जब मैंने मोबाइल खोला तो वहां मेरे पिता को ही अपराधी और विलेन की तरह पेश किया जा रहा था। यह हमारे लिए सबसे बड़ा सदमा था। जिस इंसान ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जान जोखिम में डाली, वही सोशल मीडिया की अदालत में कटघरे में खड़ा था।”
परिजनों का कहना है कि अगले ही दिन उन्हें पता चला कि हिंसा में शामिल कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज करा रहे हैं। इसके बाद घायल पुलिसकर्मियों के कई परिवार भी न्याय की मांग लेकर अदालत पहुंचे। उनका कहना है कि कानून के सामने उनका पक्ष भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाना चाहिए, जितना दूसरे पक्ष का।
घायल जवान की बेटी गुंजन ने कहा कि 20 जुलाई की रात उनके पिता के साथी उन्हें घर छोड़कर गए थे। उनके सिर पर पांच टांके लगे थे और पूरी वर्दी खून से सनी हुई थी। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर उन्हें ही अपराधी बताया जा रहा था। वहीं एक एएसआई की पत्नी सीमा ने आरोप लगाया कि भीड़ ने बैरिकेडिंग तोड़ने के बाद पत्थरों और अन्य वस्तुओं से हमला किया, जिससे उनके पति का हेलमेट तक टूट गया।
परिवारों ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक पुलिसकर्मी की नहीं, बल्कि उन सभी घरों की है, जिनके अपने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर दिन ड्यूटी पर निकलते हैं। उनका कहना था कि अगर किसी घटना की जांच होनी चाहिए तो उसमें हर पक्ष की पीड़ा और सच्चाई भी सामने आनी चाहिए।
गौरतलब है कि ‘संसद चलो’ मार्च और उससे जुड़े हिंसक घटनाक्रम के दौरान 148 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें कई गंभीर रूप से जख्मी बताए गए हैं। अब उनके परिवार चाहते हैं कि बहस सिर्फ सड़कों पर हुई हिंसा तक सीमित न रहे, बल्कि उन घरों तक भी पहुंचे, जहां उस रात खून से सनी खाकी के साथ डर, बेचैनी और अनिश्चितता भी लौटकर आई थी।
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