सिर्फ यूरिया-डीएपी से नहीं चलेगी खेती | उदयपुर कृषि महोत्सव में वैज्ञानिकों ने किसानों को दी चेतावनी, संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर

उदयपुर के बेगूं में आयोजित कृषि महोत्सव सेमिनार में वैज्ञानिकों ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खाद और मृदा संरक्षण के महत्व की जानकारी दी। कार्यक्रम में 200 किसानों ने भाग लिया।

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कृषि विज्ञान केन्द्र, चित्तौड़गढ़ एवं Chambal Fertilisers and Chemicals Limited के संयुक्त तत्वावधान में कृषि महोत्सव के तहत शुक्रवार को पंचायत समिति बेगूं के गांव मण्डावरी में ‘उर्वरकों के संतुलित उपयोग’ विषय पर फसल सेमिनार आयोजित किया गया। सेमिनार में वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को चेताया कि केवल डीएपी और यूरिया पर निर्भर खेती भविष्य में मिट्टी की सेहत और उत्पादन दोनों के लिए खतरा बन सकती है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि Dr. Pratap Singh, कुलगुरू, Maharana Pratap University of Agriculture and Technology ने ‘उर्वरकों का संतुलित उपयोग एक अनिवार्यता’ विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि मृदा एवं जल संरक्षण के साथ सतत कृषि के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि फसल उत्पादकता बढ़ाने, लागत कम करने और पर्यावरणीय जोखिमों को घटाने के लिए जैविक, जैव एवं अकार्बनिक पोषक स्रोतों का समन्वित उपयोग किया जाना चाहिए।

उन्होंने ढलान वाली भूमि और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में खेती के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जैविक खाद और जैव उर्वरकों का संतुलित उपयोग मृदा एवं जल संरक्षण उपायों को मजबूत बनाता है। इस दौरान मेड़बंदी, खाई निर्माण, समोच्च खेती, मल्चिंग, हरी खाद, आवरण फसलें, मिश्रित खेती, अंतरवर्तीय खेती और फसल चक्र जैसी उन्नत कृषि प्रणालियों के महत्व पर विशेष जोर दिया गया।

Dr. R. L. Soni ने रासायनिक उर्वरकों की मौजूदा कमी और उनके अंधाधुंध उपयोग से होने वाले दुष्प्रभावों पर चिंता जताते हुए कहा कि जैविक खादों और जैव उर्वरकों के उत्पादन एवं उपयोग में आत्मनिर्भरता बढ़ाना समय की जरूरत है।

Dr. Ratan Lal Solanki ने किसानों को पोषक तत्व प्रबंधन, फसल उत्पादन की विभिन्न शस्य क्रियाओं, पौधों में पोषक तत्वों की कमी के लक्षण और उनके समाधान की जानकारी दी। उन्होंने मिट्टी परीक्षण के लिए नमूना लेने की तकनीक, वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने की विधियां और वर्मीवाश बनाने की प्रायोगिक जानकारी भी साझा की।

Dr. Shankar Lal Jat ने किसानों से डीएपी और यूरिया के असंतुलित उपयोग को कम करने की अपील करते हुए कहा कि नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के साथ जिंक और सल्फर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग जरूरी है। उन्होंने रासायनिक खादों के साथ गोबर खाद, कंपोस्ट और जैव उर्वरकों के इस्तेमाल की सलाह दी।

वहीं Munish Bhatia ने खरीफ फसलों में खरपतवार और कीट नियंत्रण को लेकर किसानों को जानकारी देते हुए बताया कि खरपतवार 45 प्रतिशत और कीट 30 प्रतिशत तक उत्पादन घटा सकते हैं। उन्होंने पेंडिमेथालिन, इमेजाथापायर, नीम तेल और क्लोरेंट्रानिलिप्रोले (कोराजन) के उपयोग की जानकारी दी।

Nand Kishore Jat ने कहा कि मक्का, सोयाबीन और मूंगफली जैसी खरीफ फसलों में बेहतर पैदावार के लिए मृदा परीक्षण आधारित संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन जरूरी है। उन्होंने यूरिया, डीएपी, पोटाश और हरी खाद को प्रमुख स्रोत बताते हुए सही समय पर इनके उपयोग पर जोर दिया।

कार्यक्रम का संचालन Pawan Kumar Sharma ने किया। सेमिनार में करीब 200 किसानों ने भाग लिया। अंत में केन्द्र के संजय कुमार धाकड़ ने अतिथियों एवं किसानों का आभार जताया।

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